अपने हिस्से का आसमाँ
सुनीता भाटिया
नियम है उसकासोने से पहलेदो-चार बातेंवह खुद से करती ही है।न जाने कितने ख्वाबों कोपन्नों पर उतारने की नाकाम कोशिश करती है। फिर सोचती है क्यों न ख्वाब को ख्वाब ही रहने देऔर महसूसेउसे दिल से।दिल की गहराई में।खिंची है एक लकीरउसे मिटाने के लिएनाकाफी लगती हैकोई और लकीर।ये लकीरेंये एहसासचमचमाते हैं कैमरे के फ्लैश की मानिंदबिखेरते हैंकुछ पल रोशनीफिर, किसी चिडि़या की तरहहो जाते हैं, फुर्र खुले आसमान मेंऔर फिरतलाशते हैंअपने हिस्से का आसमाँ।