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Poem | अपने हिस्से का आसमाँ

सुनीता भाटिया

हिस्से का आसमाँ
ND
नियम है उसका
सोने से पहले
दो-चार बातें
वह खुद से
करती ही है।
न जाने
कितने ख्वाबों को
पन्नों पर उतारने की
नाकाम कोशिश करती है।
फिर सोचती है क्यों न
ख्वाब को
ख्वाब ही रहने दे
और महसूसे
उसे दिल से।
दिल की गहराई में।
खिंची है एक लकीर
उसे मिटाने के लिए
नाकाफी लगती है
कोई और लकीर।
ये लकीरें
ये एहसास
चमचमाते हैं
कैमरे के फ्‍लैश की मानिंद
बिखेरते हैं
कुछ पल रोशनी
फिर, किसी चिडि़या की तरह
हो जाते हैं, फुर्र
खुले आसमान में
और फिर
तलाशते हैं
अपने हिस्से का आसमाँ।