Bashir badr shayari:उजाले उनकी यादों के: डॉ. बशीर बद्र
लेखक: प्रदीप कांत (वरिष्ठ साहित्यकार)
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
खुद को दरिया कहने वाले इस शायर का नाम है डॉ. बशीर बद्र। उन्होंने यदि इस शेर में खुद को दरिया कहा, तो शायरी में अपना एक अलग मुकाम बनाकर खुद को दरिया साबित भी किया। बशीर बद्र उन चुनिंदा शायरों में से हैं, जिन्होंने अपनी एक अलग भाषा और नया मुहावरा गढ़ा। उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को पारंपरिक और कठिन शब्दों के चंगुल से निकालकर बेहद सरल और आम-फ़हम (आसानी से समझ आने वाली) भाषा दी। वे किसी बड़ी मजबूरी या मानवीय संवेदना को भी सरलतम शब्दों में बयान कर देते हैं:
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता
जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता
नज़ाकत और खुद्दारी का अनूठा संगम
एक तरफ बशीर साहब की शायरी में बेहद नज़ाकत है, तो दूसरी तरफ उनकी खुद्दार तबीयत भी साफ़ झलकती है। वे सामने वाले की गलतफ़हमी को जितनी आसानी से समझते हैं, उतनी ही सहजता से अपनी संवेदनशीलता को भी स्पष्ट कर देते हैं:
पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा
और जब वे आत्म-सम्मान या खुद्दारी की बात करते हैं, तो इस अंदाज़ में करते हैं कि सामने वाला चाहे कोई भी हो, उनके व्यक्तित्व के आगे बौना नज़र आने लगता है:
कह देना समुंदर से हम ओस के मोती हैं
दरिया की तरह तुझ से मिलने नहीं आएँगे
ध्यान देने योग्य बात यह है कि वे यहाँ खुद को ओस की 'बूँद' नहीं, बल्कि 'मोती' कहते हैं। ओस की बूँद तो सूरज की पहली किरण के साथ ही नष्ट हो जाती है, जबकि मोती का अस्तित्व लंबा होता है। यहाँ शायर का शब्दों और प्रतीकों के सही इस्तेमाल का हुनर साफ़ दिखाई देता है।
त्रासदी और सामाजिक संचेतना
सांप्रदायिकता किसी भी समाज के लिए एक बहुत बड़ा अभिशाप है। कभी-कभी लगता है कि हम कितना भी वैज्ञानिक विकास क्यों न कर लें, सांप्रदायिकता का यह भूत हमारा पीछा नहीं छोड़ता। वर्ष 1987 के मेरठ दंगों में बशीर साहब का घर जला दिया गया—उसी मेरठ में, जो कभी उन पर नाज़ करता था। जब वे इस हादसे के आघात से उबरे, तो उनके क़लम से यह ऐतिहासिक शेर निकला:
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
यह शेर सिर्फ दंगों में घर जलने की त्रासदी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आज भी उतना ही प्रासंगिक है—चाहे वह बुलडोज़र संस्कृति हो, सड़क चौड़ीकरण हो या किसी परियोजना के नाम पर लोगों का विस्थापन।
यहाँ मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर याद आता है:
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है
घर जलने के बाद बशीर साहब की कई अनमोल किताबें और बहुत सा लिखा हुआ साहित्य नष्ट हो गया। प्रसिद्ध संगीतकार विशाल भारद्वाज बताते हैं कि बशीर साहब को अपनी 90 प्रतिशत रचनाएँ ज़बानी याद थीं। तब विशाल जी ने एक साल की कड़ी मेहनत के साथ उनकी वे ग़ज़लें पुनः संकलित करवाईं।
दरअसल, मसला सिर्फ़ एक मकान के जलने का नहीं होता; उस मकान को किसी ने बड़ी मेहनत, शिद्दत और मोहब्बत से 'घर' बनाया होता है। जब वह जलता है, तो उसे केवल आर्थिक नुकसान कहकर ख़ारिज नहीं किया जा सकता। वह क्रूरता और वहशीपन इंसान के दिलो-दिमाग़ पर जो घाव छोड़ता है, उसे केवल वही समझ सकता है जो खुद भुगतभोगी हो या फिर संवेदनशील हो; अन्यथा दूसरों के लिए तो वह सिर्फ़ एक खबर बनकर रह जाती है।
नर्म लहज़ा और मारक तंज़
सामान्यतः बशीर साहब का लहज़ा बहुत नर्म है। वे अपने शेरों में कोई चोट भी करते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे रुई के फ़ाहे में लपेटकर एक छोटा-सा पत्थर फेंका गया हो—चोट महसूस भी होती है और शेर सीधे दिल में उतर जाता है। महानगरीय जीवन की औपचारिकता और बनावटी व्यवहार पर उनका यह तंज़ देखिए:
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
इसी तरह अपनों की बेरुखी पर वे लिखते हैं:
इसी शहर में कई साल से मिरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं
उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं मुझे उन का कोई पता नहीं
पढ़ने और सुनने वालों को यह शेर पढ़कर एक तल्खी (कड़वाहट) महसूस हो सकती है, लेकिन बशीर साहब के अंदाज़ में कोई चीख-पुकार या आक्रामकता नहीं है। बशीर साहब के यहाँ एक तरफ प्रिय को न पा सकने की बेबसी है, तो दूसरी तरफ वे मोहब्बत में भी एहतियात बरतते नज़र आते हैं:
ख़ुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैं ने
बस एक शख़्स को माँगा मुझे वही न मिला
मैं यूँ भी एहतियातन उस गली से कम गुज़रता हूँ
कोई मासूम क्यूँ मेरे लिए बदनाम हो जाए
यहाँ महबूब पर कोई शिकवा या गिला करने के बजाय वे उसे दुनिया की नज़रों से बचाते हुए नज़र आते हैं। वे इतने संवेदनशील शायर हैं कि उन्हें अपनी ही आवाज़ से चोट लग सकती है:
मोहब्बत से इनायत से वफ़ा से चोट लगती है
बिखरे हुए फूल हूँ मुझ को हवा से चोट लगती है
मैं शबनम की ज़बाँ से फूल की आवाज़ सुनता हूँ
अजब एहसास है अपनी सदा से चोट लगती है
तकल्लुफ़, बनावट और अदा से जिसे चोट लग सकती हो, वह इंसान भीतर से कितना पारदर्शी और सादा होगा, यह समझना कठिन नहीं है।
आम आदमी के सरोकार
तो क्या डॉ. बशीर बद्र केवल हुस्न, इश्क़ और नज़ाकत के शायर हैं? नहीं। उनके यहाँ जितने ज़ाती (व्यक्तिगत) अनुभव आते हैं, उतनी ही शिद्दत से आम आदमी के सरोकार भी उजागर होते हैं:
दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है
जो भी गुज़रा है उस ने लूटा है
ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है
इन शेरों में समाज के उस अंतिम व्यक्ति की बेबसी नज़र आती है, जिसे मुख्यधारा अक्सर अनदेखा कर देती है। एक आम इंसान कभी नफ़रत नहीं चाहता; नफ़रत तो राजनीतिक व सामाजिक स्वार्थों के लिए फैलाई जाती है। बशीर साहब आम जनमानस की इसी भावना को व्यक्त करते हैं:
सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें
आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत
सत्ता या व्यवस्था के विरोध में बोलना हमेशा से जोखिम भरा रहा है। इस घुटने टेकती अभिव्यक्ति की कश्मकश को वे सहजता से बयान करते हैं:
मैं बोलता हूँ तो इल्ज़ाम है बग़ावत का
मैं चुप रहूँ तो बड़ी बेबसी सी होती है
जीवन का सलीका और मर्यादा
बशीर साहब के यहाँ रिश्तों को जीने की एक ख़ास मर्यादा और सलीका है। बड़प्पन के सामने खुद के वजूद को बचाए रखने का हुनर वे बख़ूबी जानते हैं:
ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे
बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता
जहाँ एक तरफ वे ईश्वर के सामने खुद को नतमस्तक मानते हैं, वहीं अन्याय और अधर्म के माहौल में वे यह कहने से भी नहीं झिझकते:
यहाँ एक बच्चे के ख़ून से जो लिखा हुआ है उसे पढ़ें
तिरा कीर्तन अभी पाप है अभी मेरा सज्दा हराम है
बशीर साहब ने यह भी गहराई से महसूस किया कि आधुनिक दौर में इंसानियत खोती जा रही है और पदों व ओहदों का महत्त्व बढ़ता जा रहा है:
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
भाषा और प्रयोगशीलता (हिंदुस्तानी शैली)
बशीर साहब की शायरी का दायरा बहुत व्यापक है। उसमें प्रेम, भ्रम, दोस्ती, दुश्मनी, यादें और पश्चाताप—सब कुछ मौजूद है:
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों
अगर फ़ुर्सत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना
हर इक दरिया हज़ारों साल का अफ़्साना लिखता है
बशीर साहब का मानना था कि ग़ज़ल ऐसी कही जानी चाहिए जो उर्दू में छपे तो उर्दू की लगे और हिंदी में छपे तो हिंदी पाठक उसे अपनी मान लें। इस लिहाज़ से वे सही मायनों में 'हिंदुस्तानी' ज़बान के शायर हैं। जहाँ उन्होंने ग़ज़ल को उर्दू के कठिन शब्दों से मुक्त किया, वहीं अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्दों को भी सहजता से अपनाया:
सुनसान रास्तों से सवारी न आएगी
अब धूल से अटी हुई लारी न आएगी
ये ज़ाफ़रानी पुलओवर उसी का हिस्सा है
कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे
जीवन का अंतिम सत्य
बशीर साहब एक मुसाफ़िर की तरह अपनी शायरी के सफ़र पर आगे बढ़ते रहे:
जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा
जब किसी शायर की शोहरत शिखर पर पहुँच जाती है, तो उसके व्यावसायिक इस्तेमाल का ख़तरा भी बढ़ जाता है। बशीर साहब इस बात को समझते थे:
मुझ से क्या बात लिखानी है कि अब मेरे लिए
कभी सोने कभी चाँदी के क़लम आते हैं
फिर भी, वे शोहरत के इस चकाचौंध को क्षणभंगुर मानते थे:
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है
उन्होंने जीवन और मृत्यु के अंतिम सत्य को बेहद गहराई से समझा था। शायद इसीलिए उन्होंने यह अमर शेर लिखा था:
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
और जीवन की थकान को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा:
अजब चराग़ हूँ दिन रात जलता रहता हूँ
मैं थक गया हूँ हवा से कहो बुझाए मुझे
(नोट: डॉ. बशीर बद्र जी का 28 मई 2026 को निधन हो गया था।)
भले ही बशीर साहब अब शारीरिक रूप से हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी शायरी का उजाला और उनकी ग़ज़लें एक मशाल बनकर आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेंगी।

