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Fri, 7 Aug 2026

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हिन्दी कविता : धोखा

hindi poem
पुष्पा परजिया
धोखा कहूं किस्मत का या कहूं नसीबों की बातें
इसे दिल चीर कर रख दिया तकदीर के धोखे ने 
 
अफसाने वजूद हुआ करते थे उसके आने से 
जुगनुओं सी चमक थी जिसकी आंखों में
 
समय की धारा बहे जाती थी उसकी ,
मुस्कुराहटों को देख कर न ऐसी खबर थी
 
न ऐसा ऐतबार था की कभी,
जीवन में कभी ऐसा दर्द भी मिल सकता है,
 
तकदीर से धोखा खाने पर, दर्द के रंग बदलते देखे हमने 
बहुत इस जमाने में, पर अब दर्द ही सहारा है
 
तकदीर से धोखा खाने पर, फिर भी
यादों में बसी है वो मेरी नन्ही सी कलि   
 
अपनी मुस्कान लिए बाहें पसारे मानो
साथ ही है वो मेरे दिल में आज भी
 
न माने क्या करूं, न समझे है कितना भी समझाने से
ऐसे बड़े धोखे तकदीर के खाने से..