कविता : मैं सैनिक हूं देश का

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 मनोज चारण"कुमार" 
 
मैं हूं
विषम परिस्थितियों से जूझ रहा हूं,
मैं सबसे ये सवाल बूझ रहा हूं,
गद्दियों पे बैठे हैं जो नवाब,
मांगता हूं उनसे जवाब,
देना होगा मेरे हिस्से का हिसाब ।  
 
मैं सैनिक, हर बार जब लौटता हूं छुट्टी,
मिलती है घर पर गाय की छान टूटी,
बापूजी की खत्म हुई दवाई की शीशी,
मां के टूटे चश्मे के कांच,चूल्हे में मंदी पड़ती आंच,
बच्चों की फीस के स्मरण-पत्र
मिलते हैं ढेरों काम मुझे,
यत्र तत्र सर्वत्र।
 
मैं पर पड़ा रहता हूं,
घनघोर घन, शीत आतप सहता हूं,
मैं जो जाता हूं जब भी काम पर,
सिल जाते हैं होंठ बीवी के, भर जाती है आंख मां की,
और पापा वापस आएंगे
का चर्चा रहता है बच्चों की जुबान पर।



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