एक युगपुरुष का अवसान
4 मई की तिथि का आना मात्र कैलेंडर का पन्ना बदलना नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी रिक्तता का बोध है जिसे समय की धारा भी भरने में असमर्थ है। मेरे बचपन के अभिन्न सखा (पिपलरांवा, देवास) प्रभु जोशी जी का भौतिक शरीर भले ही हमसे दूर हो गया हो, परंतु उनकी चेतना, उनकी कलम और उनकी तूलिका आज भी कालखंडों को चुनौती देती हुई हमारे बीच जीवंत है। वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक संस्था थे- सरस्वती के वे वरद पुत्र, जिन्होंने अपनी मेधा और सृजन से हिंदी साहित्य को एक नई दृष्टि प्रदान की।
बहुआयामी सृजनशीलता
प्रभु जोशी जी की रचनात्मकता बहुआयामी थी। वे एक ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व थे, जिनके भीतर एक संवेदनशील कवि, तीक्ष्ण बुद्धि लेखक, गहन दार्शनिक और जलरंगों का जादुई चित्रकार एक साथ वास करता था। जब वे लिखते थे, तो उनके शब्द कागज़ पर नहीं, सीधे पाठक के अंतर्मन पर अंकित होते थे। उनकी लेखनी में वह धार थी जो सामाजिक कुरीतियों और मानवीय विडंबनाओं को चीरकर सत्य को सामने लाने का सामर्थ्य रखती थी। उनकी कृति 'उखड़ता हुआ बरगद' केवल एक कहानी नहीं, बल्कि विस्थापन की उस वेदना का महाकाव्य है जिसे केवल एक संवेदनशील हृदय ही महसूस कर सकता है।
साहित्यिक एवं पत्रकारिता अवदान
साप्ताहिक 'धर्मयुग', 'हिंदुस्तान', 'कादम्बिनी' और 'नवनीत' जैसे कालजयी प्रकाशनों में जब प्रभु जी की रचनाएं प्रकाशित होती थीं, तो मानो साहित्य जगत में एक नया सूर्योदय होता था। वे निपानिया, हुर हुर और पिपलरवा भूतेश्वर जैसे ग्रामीण परिवेश की सोंधी मिट्टी की गंध को अपने शब्दों में पिरोकर अंतरराष्ट्रीय फलक तक ले जाने की कला में सिद्धहस्त थे। 'नईदुनिया' के संपादकीय पृष्ठों को उन्होंने जिस बौद्धिक ऊँचाई और वैचारिक स्पष्टता से संवारा, वह पत्रकारिता के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय है। वे ज्ञान के उस हिमालय के समान थे जिसकी चोटियाँ सदैव सत्य की खोज में अडिग रहीं।
कला और आधुनिकता का संगम
एक चित्रकार के रूप में उनकी दृष्टि और भी सूक्ष्म थी। उन्होंने रंगों के माध्यम से उन भावनाओं को मूर्त रूप दिया जिन्हें शब्द शायद कभी व्यक्त न कर पाते। उनकी चित्रकारी की शांति और गहराई उनके व्यक्तित्व का ही प्रतिबिंब थी। वे 'वेबदुनिया' जैसे डिजिटल मंचों से उनके शुरुआती दिनों में ही जुड़ गए थे, जो उनकी दूरदर्शिता को दर्शाता है। वे जड़ता के विरोधी और निरंतर परिवर्तन के समर्थक थे; उनका मानना था कि साहित्य और कला को अपनी जड़ों से जुड़े रहकर समय के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
सम्मान और स्मृतियाँ
वर्ष 2010-11 में, जब मैं शासकीय महाराजा भोज स्नातकोत्तर महाविद्यालय (धार) का प्राचार्य था, तब मुझे उन्हें ससम्मान आमंत्रित करने का सौभाग्य मिला। वे और श्रीमती अनीता जोशी हमारे महाविद्यालय के सबसे प्रतिष्ठित अतिथि थे। वहां समाज सुधार पर दिया गया उनका कालजयी व्याख्यान भारत के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ। प्रभु जोशी जी को उनकी उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिए 'लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड' और प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया। उनके उस विश्वस्तरीय उद्बोधन का लाभ समस्त प्राध्यापकों, छात्रों और साहित्यकारों को मिला।
एक अक्षय धरोहर
आज जब मैं उन्हें स्मरण करता हूँ, तो उनका वह सौम्य और जिज्ञासु चेहरा आँखों के सामने आ जाता है। एक वैज्ञानिक के रूप में मैं जीवन की नश्वरता को समझता हूँ, परंतु प्रभु जोशी जैसे रचनाधर्मी कभी मृत नहीं होते। वे अपनी कहानियों के पात्रों, पेंटिंग्स के रंगों और अपने विचारों की उस ऊर्जा में सदैव जीवित रहेंगे जो उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ी है।
श्रद्धांजलि
प्रभु जी, आपका जाना साहित्य जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। आपने सिखाया कि जीवन को एक कला की तरह कैसे जिया जाता है। आपकी मेधा, विनम्रता और निश्छल व्यक्तित्व मेरे लिए एक अमूल्य धरोहर है। माँ सरस्वती के इस सच्चे साधक और मेरे मित्र को इस 4 मई 2026 के दिन मेरा शत-शत नमन। आपकी स्मृतियाँ तब तक अक्षुण्ण रहेंगी, जब तक हिंदी भाषा और साहित्य का अस्तित्व रहेगा।
- डॉ. तेज प्रकाश पूर्णानन्द व्यास पीएच.डी., डी.लिट्., डी.एससी. पादप पोषक तत्व वैज्ञानिक
(सेवानिवृत्त प्राचार्य, शासकीय महाराजा भोज पीजी कॉलेज, धार, म.प्र.)