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Written By jitendra

‘मैं मैड्रिड से हेमिंग्वे बोल रहा हूँ’

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उन्नीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक ने अभी दस्तक ही दी थी कि पूरी दुनिया युद्ध की लपटों में जल उठी। यह शुरुआत थी - प्रथम विश्व युद्ध की। अमरीका का एक युवा पत्रकार, जिसने उस समय अपने करियर की शुरुआत ही की थी, युद्ध की रिपोर्टिंग कर रहा था। लेकिन शायद सिर्फ इतना उसकी तड़प को शांत करने के लिए काफी नहीं था। हालाँकि पिता इसके सख्त खिलाफ थे, लेकिन युवा पत्रकार ने सेना में भर्ती होने की ठान ली थी। वह युद्ध की विभीषिका को और नजदीक से देखना-महसूस करना चाहता था। लेकिन वह सेना में नहीं जा सका। उसकी दृष्टि कमजोर थी। वह सेना के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया।

लेकिन उसके बाद इटली की सीमा पर रेड क्रॉस के कार्यकर्ताओं के साथ उसे दिन-रात घायलों की सेवा करते देखा गया। वह व्यक्ति अर्नेस्ट हेमिंग्वे था - उन्नीसवीं शताब्दी का एक महानतम लेखक और बुद्धिजीवी, जिसने आगे चलकर ‘द ओल्ड मैन एंड स’, ‘ए फेयरवेल टू आर्म्’ और ‘फॉर व्हूम द बेल टॉल्’ जैसी उन अविस्मरणीय कृतियों की रचना की, जो मानव सभ्यता की इमारत में नींव का पत्थर हैं

उन्नीसवीं सदी पूरी दुनिया में साहित्यिक और कलात्मक उत्थान की सबसे सुनहरी सदी थी। दो महायुद्धों की विभीषिका ने सभ्यता और सृजन में मनुष्य की आस्था को और गहरा किया। वही आस्था, जो तमाम संत्रासों के बावजूद हेमिंग्वे की रचनाओं में नजर आती है, जो अल्बेयर कामू के प्लेग में है, स्टीफेन ज्विग के उपन्यासों और रिल्के की कविताओं में है

21 जुलाई, 1899 को शिकागो के उपनगर ओक पार्क में अर्नेस्ट मिलर हेमिंग्वे का जन्म हुआ था। हेमिंग्वे से अठारह महीने बड़ी एक बहन भी थी। बहुत कोमल और संवेदनशील माँ ग्रेस के गले में सुर था और हृदय में संगीत। लेकिन अठारहवीं सदी के सामंती समाज में एक स्त्री की नियति से लड़कर निकल पाना इतना आसान भी न था। पति और परिवार की जिम्मेदारियों के बोझ से लदा जीवन कठिन था। हालातों ने उसे मनोरोगी बना दिया था। हेमिंग्वे को कला के बुनियादी संस्कार अपनी माँ से ही मिले। लंबे-लंबे बालों वाले अर्नेस्ट को बचपन में माँ फ्रॉक पहनाकर और लड़कियों की तरह सजाकर रखा करती थी

हेमिंग्वे कभी कॉलेज नहीं गए। मार्कशीट और नंबरों वाली पढ़ाई का उसके लिए कोई खास अर्थ नहीं था। इसके बजाय उसने ‘द कैनस सिटी स्टा’ में बतौर रिपोर्टर नौकरी कर ली, और यहीं से उसके लिखने की शुरुआत हुई। हेमिंग्वे ने प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान गोला-बारूद और तोप की गूँजों के बीच युद्ध की रिपोर्टिंग की थी। लेकिन मृत्यु से उसका पहला साक्षात्कार बहुत भयावह था। इटली में मिलान की सीमा पर पहली बार उसने युद्ध के नृशंस परिणाम देखे। चारों ओर खून से लथपथ क्षत-विक्षत लाशें पड़ी थीं और उसने अपने हाथों से इन लाशों को ढोया। हालाँकि उसकी आने वाली जिंदगी में मृत्यु का यह भयावह मंजर कई बार दोहराया जाना था।

सन् 1937 में हेमिंग्वे ने उत्तरी अमरीका के समाचार-पत्र ‘एलायं’ के लिए स्पेन के गृह-युद्ध की रिपोर्टिंग की। हर शाम मैड्रिड से आने वाले टेलीफोन का इंतजार होता था और दूसरी ओर से आवाज गूँजती - ‘मैं मैड्रिड से हेमिंग्वे बोल रहा हूँ।’

मिलान में एक अस्पताल में काम करते हुए हेमिंग्वे की मुलाकात आग्नेस कुरोवस्की नाम की एक नर्स से हुई थी। 19 वर्ष की आयु में जीवन में पहली बार प्रेम के अंकुर फूटे, लेकिन खिलने से पहले ही मुरझा भी गए। इस असफल प्रेम के निशान अर्नेस्ट के मनोविज्ञान पर आजीवन बने रहे। वह ताउम्र इस पीड़ा से उबर नहीं सका। उनके आत्मकथात्मक उपन्यास ‘ए फेयरवेल टू आर्म्’ में उसी टूटे प्रेम की छवियाँ हैं

हेमिंग्वे के उपन्यासों पर फिल्म भी बनी है। ‘फॉर व्हूम द बेल टॉल्’ पर इसी नाम से फिल्म बनी, जिसने दो ऑस्कर जीते। इस फिल्म की नायिका थी, इंग्रिड बर्गमैन। इंग्रिड के शानदार अभिनय ने हेमिंग्वे को कहीं गहरे छुआ और यहीं से उनके आजीवन संबंधों की शुरुआत हुई। हेमिंग्वे इंग्रिड को बेटी कर तरह मानते थे

हेमिंग्वे के सभी उपन्यास और कहानियाँ काफी हद तक आत्मकथात्मक हैं। ‘ए फेयरवेल टू आर्म्’, जिस पर बाद में फिल्म भी बनी, प्रथम विश्व युद्ध के उनके अनुभवों का ही दस्तावेज है

हेमिंग्वे जिस समय लिख रहे थे, उस समय पेरिस यूरोप की सांस्कृतिक राजधानी हुआ करता था। ज्याँ पाल सार्त्र, सिमोन द बोवुआर, अल्बेयर कामू, ज्याँ कॉक्ते और पाब्लो पिकासो जैसी दिग्गज बुद्धिजीवी-कलाकार पेरिस में थे। हेमिंग्वे भी पेरिस जा बसे और उनका सबसे महत्वपूर्ण लेखन भी उसी दौर की उपज है। हालाँकि इस बारे में कभी हेमिंग्वे ने कहा था कि सबसे अच्छा लेखन उस समय होता है, जब आप किसी से प्रेम कर रहे होते हैं। हेमिंग्वे की क्लासिक कृति ‘ओल्ड मैन एंड स’ के लिए उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया

हेमिंग्वे के परिवार में आत्महत्या की प्रवृत्ति थी। हेमिंग्वे के पिता और बहन उर्सुला और फिर आगे चलकर नातिन मार्गोक्स हेमिंग्वे ने आत्महत्या की थी। वर्ष 1961 के वसंत में एक दिन हेमिंग्वे ने खुद को गोली मार ली। उन्होंने अपनी सिर पर दो गोलियाँ दागीं और फिर सब खत्म। तीन हफ्ते बाद हेमिंग्वे का 62वाँ जन्मदिन मनाने के लिए दुनिया उनका इंतजार कर रही थी, लेकिन खुद हेमिंग्वे को इसकी जरूरत महसूस नहीं हुई। सुबह-ए-अदम नमूदार हुआ और पूरी दुनिया को स्तब्ध, अकेला छोड़ हेमिंग्वे किसी अनंत की यात्रा पर निकल चुके थे।