सुमित्रानंदन पंत : प्रकृति के सुकोमल कवि

छायावाद का अनमोल सितारा

सुमित्रानंदन पंत
भाषा|
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मौजूदा उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले की खूबसूरत वादियों में पैदा हुए के दिलो-दिमाग में प्रकृति की सुंदरता कुछ इस कदर समाई कि ताउम्र उनकी संगिनी बन कर रह गई। हिंदी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में एक माने जाने वाले सुमित्रानंदन पंत प्रकृति प्रेमी थे। 20 मई 1900 को पैदा हुए पंत की ज्यादातर रचनाएँ प्राकृतिक सौंदर्य की छटा बिखेरती नजर आती हैं। सुमित्रानंदन पंत ऐसे साहित्यकारों में गिने जाते हैं जिनका प्रकृति चित्रण समकालीन कवियों में सबसे बेहतरीन था।


आकषर्क व्यक्तित्व के धनी सुमित्रानंदन पंत के बारे में साहित्यकार राजेन्द्र यादव कहते हैं कि पंत अंग्रेजी के रूमानी कवियों जैसी वेशभूषा में रह कर प्रकृति केन्द्रित साहित्य लिखते थे। जन्म के महज छह घंटे के भीतर उन्होंने अपनी माँ को खो दिया। पंत लोगों से बहुत जल्द प्रभावित हो जाते थे। पंत ने महात्मा गाँधी और कार्ल मार्क्‍स से प्रभावित होकर उन पर रचनाएँ लिख डालीं।
हिंदी साहित्य के ‘विलियम वर्ड्सवर्थ’ कहे जाने वाले इस कवि ने महानायक अमिताभ बच्चन को ‘अमिताभ’ नाम दिया था। पद्मभूषण, ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी पुरस्कारों से नवाजे जा चुके पंत की रचनाओं में समाज के यथार्थ के साथ-साथ प्रकृति और मनुष्य की सत्ता के बीच टकराव भी होता था ।

सुमित्रानंदन पंत की प्रमुख रचनाएँ वीणा, लोकायतन, चिदंबरा और बूढ़ा चाँद आदि थीं। लेकिन उनकी सबसे कलात्मक कविताएँ ‘पल्लव’ में संकलित हैं। यह 32 कविताओं का संग्रह है।
माँ को खो चुके पंत को उनकी दादी ने पाला-पोसा और उनका नाम ‘गुसाईं दत्त’ रखा। हरिवंश राय ‘बच्चन’ और श्री अरविंदो के साथ उनकी जिंदगी के अच्छे दिन गुजरे। आधी सदी से भी ज्यादा लंबे उनके रचनाकर्म में आधुनिक हिंदी कविता का एक पूरा युग समाया हुआ है।



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