गोविंद मिश्र का रचना-संसार

जीवन की रंग-बिरंगी झाँकी

NDND
ख्यात कहानीकार-उपन्यासकार को साहित्य अकादमी पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। यह पुरस्कार उन्हें उनके उपन्यास 'कोहरे में कैद रंग' के लिए दिया गया है। उन्होंने खूब लिखा, अच्छा लिखा। कई विधाओं में लिखा। कविता, कहानी, उपन्यास, यात्रा-संस्मरण और यहाँ तक कि बच्चों के लिए भी उन्होंने साहित्य लिखा। लेकिन वे अपनी कहानियों और उपन्यासों के लिए पाठकों में याद किए जाते हैं। उपन्यास चाहे लाल-पीली जमीन हो या पाँच आँगनों वाला घर, वह अपना चेहरा हो या कोहरे में कैद रंग, उनका एक बड़ा पाठक वर्ग है। इंदौर के साहित्यकारों में इस खबर से खुशी की लहर दौड़ गई है।

आज जबकि प्रयोगधर्मिता के नाम पर पठनीयता को दरकिनार किया जा रहा है ऐसे में श्री मिश्र की कहानियाँ अपनी पठनीयता में प्रभावित करती हैं और मन का स्पर्श करती हैं। कहानीकार-उपन्यासकार सूर्यकांत नागर का मानना है कि गोविंद मिश्र के रचना-संसार में ग्रामीण और शहरी परिवेश और उसमें जीते-मरते लोगों का जीवन-संघर्ष अपनी पूरी संश्लिष्टता से अभिव्यक्त हुआ है। वे मूल्यहीनता, दोहरापन, विषमता और विसंगति को अपनी अचूक दृष्टि से मार्मिकता से व्यक्त करते हैं। उन्होंने अपनी भाषा को बोलियों की रंगत देकर समृद्ध किया है। उनकी रचनाएँ बहुत पठनीय हैं। मुझे खासतौर पर लाल-पीली जमीन और कोहरे में कैद रंग उपन्यास बेहद पसंद हैं।

फूल, इमारतें और बंदर उपन्यास में तो उन्होंने रिश्तों की उधेड़बुन को कई स्तरों पर उद्‍घाटित किया है। यूँ तो उन्होंने हर विधा में लिखा है, लेकिन कथा साहित्य में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। मुझे बहुत खुशी है कि उनके जैसे विरल और सतत रचनारत साहित्यकार को साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुना गया।

हिंदी में जब भी किसी पुरस्कार की घोषणा होती है हमेशा कोई न कोई विवाद होता है लेकिन श्री मिश्र को मिले इस पुरस्कार से तमाम साहित्यकारों को खुशी हुई होगी। कहानीकार-नाटककार विलास गुप्ते जोर देकर कहते हैं कि गोविंद मिश्र लंबे अरसे से लगातार लिख रहे हैं, यह उनकी रचनात्मक जिजीविषा का ही प्रमाण है।
  उपन्यासकार सूर्यकांत नागर का मानना है कि गोविंद मिश्र के रचना-संसार में ग्रामीण और शहरी परिवेश और उसमें जीते-मरते लोगों का जीवन-संघर्ष अपनी पूरी संश्लिष्टता से अभिव्यक्त हुआ है।      
हिंदी का पाठक पुरस्कारों की राजनीति से वाकिफ है लेकिन श्री मिश्र को यह पुरस्कार दिया जाना निर्विवाद है जो चुपचाप और लगातार लिख रहे हैं। वे प्रचार-प्रसार से दूर अपने रचना-संसार में डूबे रहते हैं। उन्होंने खूब लिखा है और व्यापक फलक पर अपने समय के यथार्थ को रचा है। उन्होंने मौजूदा सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में मनुष्य की मानसिक या अंदरूनी हलचलों, बदलावों और प्रभावों को बहुत ही बारीक ढंग से चित्रित किया है।

आर्थिक दबाव किस तरह से किसी व्यक्ति की बाहरी और आंतरिक दुनिया को बदलते हैं, उनका कथा-संसार इस बात का बेहतर आईना हैं। जबकि कहानीकार-उपन्यासकार डॉ. शरद पगारे का कहना था कि निःसंदेह वे एक बेहतरीन लेखक हैं और उन्होंने अपने प्रशासक की छवि से ऊपर अपने लेखक की एक बड़ी और उजली छवि बनाई है। अपनी सिद्धहस्त लेखनी से उन्होंने हिंदी कथा-संसार में कुछ मार्मिक कहानियाँ और उपन्यास लिखे हैं। उनके साहित्य में मध्यमवर्गीय संत्रास है। इस वर्ग की महत्वाकांक्षा, संघर्ष को स्वर दिए हैं। की झाँकी को उन्होंने यथार्थवादी कल्पना से जीवंत किया है। उनकी कहानियों-उपन्यासों के पात्र हमारे आसपास के जीवन से निकलकर हमारी ही सोई संवेदनाओं को जगाने का काम बखूबी कर जाते हैं।

यह हिंदी रचना-जगत का एक बड़ा दुर्भाग्य है कि हिंदी का लेखक जीवनभर लिखता रहता है और अपने जीवन के ढलते वर्षों में उसे कोई सम्मान या पुरस्कार दिया जाता है।

रवींद्र व्यास|
साहित्यकारों की राय
कवि राजकुमार कुंभज कहते हैं कि गोविंद मिश्र को यह पुरस्कार बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। यह पुरस्कार उन्हें बहुत देर से मिला है। इधर नाउम्मीदों के लेखकों की हिंदी में जो बाढ़ आई है उसमें श्री मिश्र उम्मीदों के लेखक हैं। उनके घराने में हम कोहरे में कैद रंग भी देख सकते हैं, उतरती धूप भी और वह अपना चेहरा भी देख सकते हैं जो जीवन में जीने की प्यास जगाता है। उनके साहित्य को किसी एक रंग में नहीं बताया जा सकता है। उन्होंने इतना विपुल लिखा है कि उनका संसार रंग-बिरंगा संसार है।

 

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