Gudi Padwa 2022: इसलिए विशेष है गुड़ी पड़वा का त्योहार, जानें इससे जुड़ीं 25 मान्यताएं

Last Updated: गुरुवार, 31 मार्च 2022 (18:50 IST)
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Hindu Nav Varsh 2022 : नव संवत्सर 2079 इस बार 2 अप्रैल शनिवार से शुरू होगा जिसे गुड़ी पड़वा, युगाड़ी, उगाड़ी, नव संवत्सर पड़वो, युगादि, नवरेह, चेटीचंड, विशु, वैशाखी, चित्रैय तिरुविजा, सजिबु नोंगमा पानबा या मेइतेई चेइराओबा के नाम से भी जाना जाता है। आओ जानते हैं इस पर्व से जुड़ी 25 मान्यताएं।


गुड़ी पड़वा की 25 मान्यताएं- 25 beliefs of Gudi Padwa

1. इसे प्रकृति के परिवर्तन का पहला दिन माना जाता है। नववर्ष में पतझड़ के बाद नए सिरे से प्रकृति में जीवन की शुरुआत होती है। वसंत की बहार आती है।

2. इस दिन धरती का एक चक्र पूर्ण हो जाता है। मान्यता है कि चैत्र माह में धरती अपना एक चक्र पूरा कर लेती है। धरती के अपनी धूरी पर घुमने और धरती के सूर्य का एक चक्कर लगाने लेने के बाद जब दूसरा चक्र प्रारंभ होता है असल में वही नववर्ष होता है।
3. कहते हैं कि ब्रह्म पुराण अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ब्रह्मा ने सृष्टि रचना की शुरुआत की थी। उन्होंने इस प्रतिपदा तिथि को सर्वोत्तम तिथि कहा था इसलिए इसको सृष्टि का प्रथम दिवस भी कहते हैं।

4. इस दिन से 60 संवत्सरों में से एक नया संवत्सर प्रारंभ होता है। जैसे धरती के 12 मास होते हैं उसी तरह बृहस्पति ग्रह के 60 संवत्सर होते हैं। इसीलिए इसे नव संवत्सर भी कहते हैं। संवत्सर अर्थात बारह महीने की कालविशेष अवधि। बृहस्पति के राशि बदलने से इसका आरंभ माना जाता है।

5. मान्यता के अनुसार इसी दिन से वसंत ऋतु का प्रारंभ होता है।

6. मान्यता के अनुसार इसी दिन से रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है।

7. प्रतिपदा' के दिन ही पंचांग तैयार हुआ था। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीने और वर्ष की गणना करते हुए ‘पंचांग' की रचना की थी। पंचांग के पांच अंग हैं- 1. तिथि, 2. नक्षत्र, 3. योग, 4. करण, 5. वार (सप्ताह के सात दिनों के नाम)। भारत में प्राचलित श्रीकृष्ण संवत, विक्रम संवत और शक संवत सभी उक्त काल गणना और पंचांग पर ही आधारित है।

8. इसी दिन से ग्रहों, वारों, मासों और संवत्सरों का प्रारंभ गणितीय और खगोल शास्त्रीय संगणना के अनुसार माना जाता है।

9. इसी दिन से सतयुग की शुरुआत भी मानी जाती है।

10. इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था।

11. इसी दिन से बसंत नवरात्र की शुरुआत भी मानी जाती है।

12. इसी दिन को भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था और पूरे अयोध्या नगर में विजय पताका फहराई गई थी।

13. ज्योतिषियों के अनुसार इसी दिन से चैत्री पंचांग का आरम्भ माना जाता है, क्योंकि चैत्र मास की पूर्णिमा का अंत चित्रा नक्षत्र में होने से इस चैत्र मास को नववर्ष का प्रथम दिन माना जाता है।

14. इसी दिन से सौर, चंद्र, नक्षत्र और सावन मास पर आधारित है 58 ईसा पूर्व राजा विक्रमादित्य ने विक्रम संवत नाम से एक कैलेंडर प्रारंभ किया था। क्योंकि इसी दिन राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजयी प्राप्त करके चक्रवर्ती और आदित्य की उपाधि धारण की थी।

15. इसी दिन से भारत में बहिखाते नए किए जाते हैं, क्योंकि यह नए वर्ष का प्रथम दिन है।
Gudi padwa 2022
16. इसी नववर्ष में 12 माह के एक वर्ष, 30 दिन का एक माह और 7 दिन के एक सप्ताह का प्रचलन हुआ। विक्रम कैलेंडर की इस धारणा को यूनानियों के माध्यम से अरब और अंग्रेजों ने अपनाया। बाद में भारत के अन्य प्रांतों ने अपने-अपने कैलेंडर इसी के आधार पर विकसित किए।

17. हिन्दू नवर्ष सूर्योदय से प्रारंभ होता है। प्रत्येक दिवस का प्रारंभ सूर्योदय से होता है और अगले सूर्योदय तक यह चलता है। सूर्यास्त को दिन और रात का संधिकाल मना जाता है।

18. हिन्दू कैलेंडर में चैत्र माह इसका पहला माह और फाल्गुन माह इसका अंतिम माह हैं। प्रत्येक माह शुक्ल और कृष्ण पक्ष मिलाकर 30 तिथियों में बंटा हुआ है। चैत्र माह में ही बसंत का आगमन होता है।
19. हिन्दू कैलेंडर सौरमास, नक्षत्रमास, सावन माह और चंद्रमास पर आधारित है। मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क आदि सौरवर्ष के माह हैं। चैत्र, बैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ आदि चंद्रमास के नाम है। नक्षत्रमास चित्रा नक्षत्र से प्रारंभ होता है। चित्रा नक्षत्र चैत्र मास में प्रारंभ होता है। सावन वर्ष 360 दिनों का होता है। इसमें एक माह की अवधि पूरे तीस दिन की होती है।


20. हिन्दू नववर्ष का प्रारंभ चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होता है। इस नववर्ष के प्रथम दिन को प्रत्येक राज्य में अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है। जैसे गुड़ी पड़वा, युगाड़ी, उगाड़ी, नव संवत्सर पड़वो, युगादि, नवरेह, चेटीचंड, विशु, वैशाखी, चित्रैय तिरुविजा, सजिबु नोंगमा पानबा या मेइतेई चेइराओबा के नाम से भी जाना जाता है।
21. रात्रि के अंधकार में नववर्ष का स्वागत नहीं होता। नया वर्ष सूरज की पहली किरण का स्वागत करके मनाया जाता है।

22. नववर्ष के ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से घर में सुगंधित वातावरण कर दिया जाता है। घर को ध्वज, पताका और तोरण से सजाया जाता है।

23. नववर्ष में घर पर ध्वज पताका फहराकर एक-दूसरे को तिलक लागते हैं और नववर्ष की बधाई देते हैं। एक दूसरे को तिलक लगाते हैं। मिठाइयां बांटते हैं। नए संकल्प लिए जाते हैं। श्रीखंड खाकर दिन की शुरुआत करते हैं।इस दिन ब्राह्मण, कन्या, गाय, कौआ और कुत्ते को भोजन कराया जाता है।

24. इस दिन, कई जुलूस सड़क पर आयोजित किए जाते हैं। लोग नए परिधानों में तैयार होते हैं। लोग अपने दोस्तों और परिवार के साथ उत्सव का आनंद लेते हैं और सड़क पर जुलूस का हिस्सा बनते हैं। लोग उनके घरों में, विशेष और पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं जैसे पूरन पोली, पुरी और श्रीखंड, मीठे चावल जिन्हें लोकप्रिय रूप से सक्कर भात कहा जाता है। हर प्रांत के अपने अलग व्यंजन होते हैं।
25. ज्योतिष मान्यता के अनुसार जिस वार को नववर्ष का प्रारंभ होता है उस वार के ग्रहदेव का उस वर्ष पर प्रभाव रहता है और उसी के अनुसार भविष्यफल जाना जाता है। जैसे नव संवत्सर 2079 इस बार 2 अप्रैल शनिवार से शुरू होगा, न्याय के देवता शनि ग्रह का 2022 में रहेगा जबरदस्त प्रभाव। इस वर्ष का मंत्री मण्डल- राजा-शनि, मन्त्री-गुरु, सस्येश-सूर्य, दुर्गेश-बुध, धनेश-शनि, रसेश-मंगल, धान्येश-शुक्र, नीरसेश-शनि, फलेश-बुध, मेघेश-बुध रहेंगे। संवत्सर का निवास कुम्हार का घर एवं समय का वाहन घोड़ा है।

फल : कहते हैं कि जिस वर्ष समय का वाहन घोड़ा होता है उस वर्ष तेज गति से वायु, चक्रवात, तूफान, भूकंप भूस्खलन आदि की संभावना बढ़ जाती है। मानसिक बैचेनी भी बढ़ जाती है और तेज गति से चलने वाले वाहनों के क्षतिग्रस्त होने की भी संभावना बढ़ जाती है।



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