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Written By WD

भगवान गणेश की प्रिय दुर्वा की महिमा

महालक्ष्मी की छोटी बहन है दुर्वा

दुर्वा
‍- विद्या मिश्रा
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दुर्वा यानी दूब जैसा कोई अन्य पदार्थ, इस धरा पर हो ही नहीं सकता, जो देव मनुष्य व पशु तीनों को ही प्रिय है। नन्ही दूब के आचमन से देवता, दूब आच्‍छादित मैदानों पर भ्रमण से मनुष्य और भोजन के रूप में पशु इसको पाकर प्रसन्न रहते हैं। खेल के मैदान, मंदिर, बाग-बगीचे में उगी नन्ही दूब का मखमली हरा गलीचा सबको अपनी ओर आकर्षित करता है। सबके पांव से रगड़ खाती, विपरी‍त परिस्थितियों में भी जीवित रहती, देवताओं को प्रिय व मानव के लिए मंगलकारी व आरोग्य प्रदायक है।

हरी कोमल दूब का महत्व :
अनेक युगों से हरी कोमल दूब का मैदान सर्वप्रिय और उद्यानों का आवश्यक अंग रहा है। अथर्ववेद तथा कौटिल्य अर्थशास्त्र में हरी व कोमल दूब का संदर्भ मिलता है। पुराणों में भी नंदन वन का वर्णन मिलता है। वाटिकाओं में समतल व ऊंची-नीची घुमावदार भूमि पर कोमल हरी दूब लगी हुई है, जिस पर कुलांचे मारते हिरण घास चर रहे हैं और गाय बड़े चाव से घास खाकर जुगाली कर रही है।

सम्राट विक्रमादित्य और अशोक के काल में भी हरित घास मैदानों की बहुलता थी। मुगलकाल से पूर्व व पश्चात उद्यान कला अत्यंत वि‍कसित थी। हरे घास के मैदानों पर विभिन्न प्रकार के घुमावदार बेलबूटों युक्त कटाव के उभार उपवनों शोभा बढ़ाते थे। कश्मीर, मैसूर के वृंदावन गार्डन के ‍हरित घास के उपवन, हैदराबाद में फिल्म सिटी के बगीचों की हरित आभा की झलक से मन पुलकित हो जाता है।

पौराणिक संदर्भों से ज्ञान होता है कि क्षीर सागर से उत्पन्न होने के कारण भगवान विष्णु को यह अत्यंत प्रिय रही और क्षीर सागर से जन्म लेने के कारण लक्ष्मी की छोटी बहन कहलाई।

विष्च्यवादि सर्व देवानां, दुर्वे त्वं प्रीतिदायदा।
क्षीरसागर सम्भूते, वंशवृद्धिकारी भव।।

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गौरीपूजन, गणेश पूजन में दुर्वा दल से आचमन अ‍त्यंत शुभ माना गया है। जहां रत्नभूषित, झिलमिल करती इंद्रधनुषी छटा बिखेरे लक्ष्मी रहती है वहीं हरित वस्त्रों मे लिपटी सुकुमार कन्या के अक्षय रूप से कौन आकर्षित न होगा? बलवर्धक दुर्वा कालनेमि राक्षस का प्राकृतिक भोजन थी। इसके सेवन से वह अति बलशाली हो गया था। महर्षि दुर्वासा को भी दुर्वा रस अत्यंत प्रिय था।

तुलसीदास ने इसे अन्य मांगलिक पदार्थों के समकक्ष माना।

दधि दुर्वा रोचन फल-फूला,
नव तुलसीदल मंगल मूल

वा‍ल्मीकि ऋषि ने भी भगवान राम के वर्ण की तुलना दुर्वा से कर इसको कितना सम्मान दिया है-

रामदुर्वा दल
श्यामे,
पद्याक्षं पीतवाससा

यह पौधा जमीन पर रेंगता, चलने में बाधा नहीं पहुंचाता, विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रहता हुआ विनम्रता व दृढ़ता का पाठ पढ़ाता है। प्रखर सूर्य किरणों में यह ऊपर से सूख जाती है लेकिन मूल में प्राण रहते हैं और जरा-सी जल की बूंदों से पुन: हरी हो जाती है।

कहा जाता है कि इसकी जड़ें पाताल लोक तक जाती हैं और अमृत खींचती हैं। विनम्रता, दृढ़ता, अमरत्व, सर्व मंगलकारी होने के कारण ही प्रत्येक युग में नन्हीं दूब के विशाल गुणों से कोई-न-कोई संत अवश्य प्रभावित रहा है, तब ही गुरुनानक ने इसके जीवन का अनुसरण करने की प्रेरणा दी है-

नानक नन्हों हो रहो, जैसे नन्हीं दूब।
और घास सबै जल जाएगी, दूब खूब की खूब

महाराणा प्रताप के दुर्दिनों में भी घास उनके परिवार का सहारा बनी।

जिस प्रकार यह स्वयं बढ़ती है उसी प्रकार यह वंश वृद्धि की भी संकेतक है। आज भी राजस्थान में अनेक परिवारों में पुत्र जन्म की सूचना दूर-देश के संबंधियों नाना, दादा, मामा को भेजनी होती है तो संदेशवाहक कुछ न कहकर केवल दुर्वा दल के ही दर्शन कराते हैं।

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इसका अर्थ यही है कि पुत्र जन्म हुआ है। इस कृत्य को 'हरी दिखाना' कहते हैं। अगर डाक द्वारा सूचना भेजनी हो तो लिफाफे में दो-तीन तिनके दूब के डाल दिए जाते हैं, जो कि शुभ सूचना के प्रतीक होते हैं। विवाह में वरमाला में भी दुर्वा दल का उपयोग शुभ माना जाता है। आजकल इसका उपयोग नहीं किया जाता है।

नटखट जड़ोंवाली घास :
दूब का पौधा एक बार लगाने के बाद उस जगह से नष्ट करना मुश्किल है। यह नन्ही नटखट अपनी जड़ें (गांठें) जमीन में रोपती पसरती ही जाती है। विश्व के अलग-अलग देशों में इसकी अनेक प्रजातियां उपलब्‍ध हैं। भारत में प्राय: तीन वर्णों की दूब दिखाई देती है- श्याम हरित, हर‍ित व श्वेत। श्याम हरित दूब दक्षिण भारत में दिखाई देती है। हर‍ित उत्तरी भारत व राजस्थान, गुजरात में दिखाई देती है। मरुप्रदेश, जोधपुर की हरित बारीक, कोमल दुर्वा विश्वप्रसिद्ध है।

संस्कृत भाषा में यह अनेक पर्वों (गांठों) के कारण शत पर्वा, स्वाभाविक तरीके से उगने के कारण (रुहा), प्रसार का अंत नहीं होने के कारण अनम्ता के नाम से भी जानी जाती है। रासायनिक तौर पर दुर्वा रस में क्लोरोफिल के साथ प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट व आंशिक रूप से अनेक लवण भी विद्यमान रहते हैं। इसमें अनेक आरोग्यदायी व रोगहर गुण हैं लेकिन इनका उपयोग कम होता जा रहा है।