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राजू का उपहार
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देवेंद्र वर्मा मिस रूपाली बैठी हैं गार्डन में मायूस। वादा करके ना आया राजकिरण मनहूस।। पुष्य नक्षत्र के वक्त भी भूल गया मक्कार। शायद आज लाए मुझे, प्यारे गोल्ड का हार।।तभी आ गया राजकिरणलिए बड़ा-सा गिफ्ट। सॉरी बेबी, आज मिलीमुझे देर से लिफ्ट ।। गाड़ीवाले आजकल हुए बड़े बेदर्द लिफ्ट देते हैं लेडी को खड़े रोते हैं मर्द ।। बहरहाल जाने जिगर, गिफ्ट संभालो, प्लीज। वह बोली- क्यों लाए हो, इतनी महँगी चीज??कुछ भी मुझको नहीं है तुमसे बढ़कर प्यारा । लगता है तुम ले आए, आज सराफ़ा सारा।। पुष्य नक्षत्र तो बीत गया, फिर क्यों इतना सोना? राजकिरण कहने लगा, जान ख़फा मत होना।। पुष्य नक्षत्र तो चला गयाअब तुम उसको भूलो।धनतेरस और रूप चतुर्दशी के उपहार ये ले लो।। धड़कते दिल से रूपाली ने खोला जब उपहार।गश आया, मचने लगा दिल में हाहाकार।। पीतल की एक बाल्टी थी, साबुन एक गुलाबी। बोला- ये चीजें फर्स्ट हैंड हैं, नहीं संदेह जरा-भी।। राजू के भोलेपन पर, रूपा के लब मुस्काए। बाँहों में भर बोली- हाय ! बलमा अनाड़ी मन भाए।। तभी एक चिडि़या बोली- मिटे सकल अंधकारप्रेम के दीप जलाओ, सभी को शुभकामना अपार।।