रंग नहीं चढ़ता मुखौटों पर
- महेन्द्र सांघी
सुना था कि होली के दिन
दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैं।
रंगों से लैस होकर हम निकले
सोचा, दुश्मनों से होली खेल आते हैं।
न उन पर रंग चढ़ा, न हम पर
सभी बेरंग ही घर लौटे
हमारी तरह उन्होंने भी चेहरे पर
पहन रखे थे दोस्ती के मुखौटे।
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सुना था कि होली के दिन
दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैं।
रंगों से लैस होकर हम निकले
सोचा, दुश्मनों से होली खेल आते हैं।
न उन पर रंग चढ़ा, न हम पर
सभी बेरंग ही घर लौटे
हमारी तरह उन्होंने भी चेहरे पर
पहन रखे थे दोस्ती के मुखौटे।
