बौड़मजी स्पीच दे रहे थे मोहल्ले में, लोग सुन ही नहीं पा रहे थे हो-हल्ले में। सुनिए सुनिए ध्यान दीजिए, अपने कान मुझे दान दीजिए। चलिए तालियाँ बजाइए, बजाइए, बजाइए समारोह को सजाइए ! नहीं बजा रहे कोई बात नहीं, जो कुछ है वो अकस्मात नहीं। सब कुछ समझ में आता है, फिर भी बौड़म आपको जो बताता है उस पर गौर फरमाइए फिलहाल- हमारी आजादी को पचास साल यानी पाँच दशक बीते हैं, श्रीमान ! उन पाँच दशकों की हैं पाँच सीढ़ियाँ, पाँच सोपान। इस दौरान हम समय के साथ-साथ आगे बढ़े हैं, अब देखना ये है कि हम इन पाँच सीढ़ियों पर उतरे हैं या चढ़े हैं ! पहला दशक, पहली सीढ़ी- सदाचरण यानी काम सच्चा करने की इच्छा, दूसरा दशक, दूसरी सीढ़ी- आचरण यानी उसके लिए प्रयास अच्छा। तीसरा दशक, तीसरी सीढ़ी- चरण यानी थोड़ी गति, थोड़ा चरण छूना, चौथा दशक, चौथी सीढ़ी- रण यानी आपस की लड़ाई और जनता को चूना। पाँचवाँ दशक, पाँचवीं सीढ़ी बची- न ! यानी कुछ नहीं यानी शून्य, यानी जीरो, लेकिन हम फिर भी हीरो।
ये बात मैंने आपको इसलिए बताई, कि बौड़मजी ने एक ही शब्द के जरिए पिछले पाँच दशकों की झनझानती हुई झाँकी दिखाई। पहले सदाचरण फिर आचरण फिर चरण फिर रण और फिर न ! यही तो है पाँच दशकों का सफर न !
मैंने पूछा - बौड़मजी, बताइए अब क्या करना है ? वे बोले- करना क्या है इस बचे हुए शून्य में रंग भरना है। और ये काम हम तुम नहीं करेंगे, इस शून्य में रंग तो अगले दशक के बच्चे ही भरेंगे।