Apara ekadashi katha: अपरा एकादशी व्रत की पौराणिक कथा
ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को 'अपरा' या 'अचला' एकादशी के नाम से जाना जाता है। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह एकादशी 'अपार' धन और असीमित पुण्य प्रदान करने वाली मानी गई है। प्रतिवर्ष ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन अपरा एकादशी का व्रत रखा जाता है। इस एकादशी को अचला एकादशी भी कहते हैं। चलिए पढ़ते हैं ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी की प्रामाणिक व्रत कथा।
Apara achala ekadashi vrat ki pauranik katha: अपरा एकादशी व्रत की पौराणिक कथा
1. श्री कृष्ण और युधिष्ठिर का संवाद
धर्मराज युधिष्ठिर के जिज्ञासावश पूछने पर भगवान श्री कृष्ण ने इस व्रत की महिमा का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि यह व्रत भगवान त्रिविक्रम को समर्पित है। यह व्रत पापरूपी अंधकार को नष्ट करने के लिए सूर्य के समान और पापरूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी के समान शक्तिशाली है।
2. किन पापों से मिलती है मुक्ति?
अपरा एकादशी का व्रत केवल सामान्य भूलों को ही नहीं, बल्कि भीषण पापों के प्रभाव को भी कम करने की शक्ति रखता है:
गंभीर अपराध: ब्रह्म हत्या, परस्त्री गमन, और झूठी गवाही देने जैसे पाप।
धार्मिक अपराध: गुरु की निंदा करना, झूठे शास्त्रों की रचना करना या गलत ज्योतिष/वैद्य बनकर लोगों को ठगना।
कर्तव्य से विमुख होना: युद्ध क्षेत्र से भागे हुए क्षत्रिय को भी इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है।
3. दुर्लभ फलों के समान पुण्य
भगवान कृष्ण के अनुसार, अपरा एकादशी का फल उन दुर्लभ अवसरों के समान है जिन्हें प्राप्त करने के लिए मनुष्य वर्षों प्रतीक्षा करता है:
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कार्तिक पूर्णिमा पर पुष्कर स्नान या गंगा तट पर पितरों का पिंडदान।
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सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्नान।
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कुंभ के दौरान केदारनाथ या बद्रीनाथ के दर्शन।
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स्वर्ण दान या गौ दान से मिलने वाला पुण्य।
4. पौराणिक कथा: राजा महीध्वज और प्रेत योनि से मुक्ति
प्राचीन काल में महीध्वज नाम के एक अत्यंत धर्मात्मा राजा थे। उनका छोटा भाई वज्रध्वज स्वभाव से क्रूर और अधर्मी था। द्वेषवश एक रात वज्रध्वज ने अपने बड़े भाई की हत्या कर दी और उनके शरीर को एक जंगली पीपल के पेड़ के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु के कारण राजा महीध्वज की आत्मा 'प्रेत' बनकर उसी पीपल के पेड़ पर निवास करने लगी और वहां से गुजरने वालों को परेशान करने लगी।
ऋषि धौम्य का आगमन और उद्धार
एक दिन धौम्य ऋषि उस रास्ते से निकले। उन्होंने अपने तपोबल से उस प्रेत के कष्ट और उसके अतीत को जान लिया। ऋषि को राजा की स्थिति पर दया आ गई। उन्होंने:
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प्रेत को पीपल के पेड़ से नीचे उतारा।
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उसे परलोक विद्या का ज्ञान दिया।
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स्वयं राजा की मुक्ति के लिए अपरा एकादशी का व्रत किया।
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व्रत से प्राप्त होने वाला सारा पुण्य उस प्रेत को दान कर दिया।
परिणाम: एकादशी के पुण्य प्रभाव से राजा महीध्वज प्रेत योनि के कष्टों से मुक्त हो गए। उन्होंने दिव्य शरीर धारण किया और ऋषि को प्रणाम कर पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग लोक को प्रस्थान किया।
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वेबदुनिया धर्म-ज्योतिष टीम
पौराणिक कथा, इतिहास, धर्म और दर्शन के जानकार, अनुभवी ज्योतिष, लेखक और विषय-विशेषज्ञों द्वारा लिखे गए आलेखों का प्रकाशन किया जाता है।....
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