अच्छे स्वास्थ्य के लिए कैसे जागृत करें प्राण शक्ति, पढ़ें सरल विधि


 
प्राण शक्ति की सरल विधि 
 
किसी एकांत एवं स्वच्छ हवादार स्थान में चित्त लेटकर शरीर को शिथिल कर लें- अपना मुंह बंद रखें। फिर नासिका से धीरे-धीरे आसानी से गहरी सांसे लीजिए। 
 
अपने हाथों की अंगुलियों को अपने कपाल के मध्य इस प्रकार रखें कि दोनों हाथों की अंगुलियों का आपस में स्पर्श होता रहे और दोनों अंगूठों से आप कनपटियों को दबाते रहे। अब आज्ञा चक्र याने मस्तिष्क में मध्य बिंदु पर विचारों औरं चित्तवृत्तियों को एकाग्र कर संपूर्ण शरीर में विद्युत प्रवाह की अद्भुत अनुभूति करें। 
 
साथ ही अंतर्मन में ॐ (ओंकार) नाद का स्मरण करें, फिर हाथों से स्पर्श करते हुए माथे के नीचे नेत्र का स्पर्श करते हुए दोनों अंगूठों को गर्दन की दोनों बगलों से कंठ की हड्डी पर अंगुलियों को मिलाकर स्पर्श करें, बाद में हाथों को कंधों पर से शरीर की दोनों बगलों पर अं गूठे से दबाते हुए अपनी नाभी यानी मणिपुर चक्र में स्पर्श करते हुए अपने विचार प्रवाह को शक्ति रूप में अवधारित करें। 
 
पीड़ित अंगों पर कुछ समय रुक कर उन अंगों पर शक्ति प्रवाह का संचार अनुभव करें। इस सर्वांग स्पर्श में तीन मिनट का समय लगना चाहिए। रात को शयन के समय यह अभ्यास करने से शांत, स्वस्थ एवं प्रचुर मात्रा में नींद आती है। 
 
जिस समय अपने हाथ को किसी अंग पर रोकें तो श्वास भी रोक दें तथा अपने मन में संकल्प करें कि मैं अपने रक्त संचार को नियमित कर रहा हूं। कण-कण में नवीन रक्त निर्माण हो रहा है। समस्त शारीरिक क्षीणता, दुर्बलता, जीर्ण अवयव, अनावश्यक पदार्थ शरीर से पृथक होकर शरीर सुंदर, बलवान, सुपुष्ट हो रहा है। 
 
इस प्रकार मनुष्य संकल्प बल के आधार पर आकर्षण शक्ति का संचय करके दूसरों में नई प्राण चेतना डाल सकता है। वह अपनी दृढ़ता के बल पर अंतर्मन से शक्ति प्राप्त करता है, क्योंकि प्राण चिकित्सा का रहस्य भी अंतर्मन ही है- जब हमारा अंतर्मन अनुकूल व्यवहार करता है तब सभी उद्देश्यों में सफलता मिलती है। 
 
जब शरीर में दुर्बलता, भय, निरुत्साह, संशय, निराशा, निष्फलता का अहसास होता है तो स्वास्थ्य में खराबी आती है, वहीं, आशा, प्रसन्नता, उत्साह, नव निर्माण, नव चेतना, प्रेम, सुख, सौंदर्य, बल, वीर्य का अनुभव कर शरीर स्वयं आरोग्यता से संचालित होकर निरोगी रहता है। 
 
प्राण चिकित्सा का मुख्य उद्देश्य भी यही है कि व्यक्ति स्वयं अपने शरीर के ज्ञान-तंतुओं को बलवान बनाकर अन्य रोगियों को भी स्वस्थ करे। विचारों का श्वास-प्रश्वास पर गहरा और सीधा प्रभाव होता है यानी प्रसन्नता में श्वास हल्का तथा शोक में श्वास भारी हो जाता है और हम इसे अपनी आत्म सूचना द्वारा अनुभव कर इस पर अधिकार प्राप्त कर सकते हैं।> > -तन्मय वेद 'तन्मय'



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