जिसके भी पास रहा कोहिनूर, वो हो गया बर्बाद!

अनिरुद्ध जोशी| Last Updated: सोमवार, 22 फ़रवरी 2021 (15:07 IST)
अहमद शाह दुर्रानी : शाहशुजा से पहले कोहिनूर हीरा अफगानिस्तान के शहंशाह अहमद शाह दुर्रानी के पास था। अहमद शाह दुर्रानी की 16 अक्टूबर 1772 में मृत्यु हुई। उनकी मौत के बाद उनके वंशज शाहशुजा दुर्रानी के पास यह हीरा था। हमने पहले ही बताया है कि किस तरह शाहशुजा से यह हीरा महाराजा रणजीत सिंह के पास पहुंचा। 
 
पर कुछ समय बाद महमूद शाह ने शाहशुजा को अपदस्थ कर दिया दिया था। अहमद शाह अब्दाली का पौत्र था महमूद शाह। इसके पिता का नाम तैमूर शाह और भाई का नाम नाम जमान शाह था। जमान शाह को मारकर महमूद शाह गद्दी पर बैठा था।
 
1813 ई. में अफगानिस्तान के अपदस्थ शहंशाह शाहशुजा कोहिनूर हीरे के साथ भागकर लाहौर पहुंचा। उसने कोहिनूर हीरे को पंजाब के राजा रणजीत सिंह को दिया एवं इसके एवज में राजा रणजीत सिंह ने शाहशुजा को अफगानिस्तान का राजसिंहासन वापस दिलवाया था।
 
नादिर शाह के पास था कोहिनूर : अहमद शाह दुर्रानी के पहले ईरानी शासक नादिर शाह के पास यह कोहिनूर था। कहते हैं कि नादिर शाह ने ही इस हीरे का नाम 'कोहिनूर' रखा था। इससे पहले इसका क्या नाम था? यह शोध का विषय है। नादिर शाह ने यह हीरा सन् 1739 में हासिल किया था। 
 
भारत से कोहिनूर ले जाने के ठीक 8 साल बाद यानी 1747 में नादिर शाह की हत्या कर दी गई और कोहिनूर हीरा अफगानिस्तानी शहंशाह अहमद शाह दुर्रानी के पास पहुंच गया। दुर्रानी की मौत के बाद उनके वंशज शाहशुजा दुर्रानी ने इस हीरे को अपने पास रखा। लेकिन इसी के कारण उसके भी बुरे दिन शुरू हो गए थे। शाहशुजा कश्मीर में कैद हो गए थे जिसे बाद में महाराजा रणजीत सिंह ने आजाद कराया था। शाहशुजा ने तब यह हीरा रणजीत सिंह को दे दिया था।
 
अकबर ने कभी नहीं रखा कोहिनूर इसीलिए वह सफल रहा : कोहिनूर को अकबर ने कभी नहीं रखा और यही कारण रहा कि उसका शासन लंबे काल तक चला। बाद में यह अकबर के पोते शाहजहां के खजाने में पहुंच गया। शाहजहां को उसके बेटे ओरंगजेब ने कीले में कैद कर दिया था।
 
नादिर के पहले था शाहजहां के पास कोहिनूर : सन् 1739 में फारसी शासक नादिर शाह भारत आया और उसने मुगल सल्तनत पर आक्रमण कर दिया। उस वक्त दिल्ली पर औरंगजेब का राज था। औरंगजेब शाहजहां का पुत्र था। शाहजहां का एक सिंहासन था जिसे तख्त-ए-ताउस कहते थे। कोहिनूर इस तख्त-ए-ताउस में ही जड़ा हुआ था। जब तक यह शाहजहां के पास था, तब तक उनकी शौहरत, दौलत और साम्राज्य तो बढ़ता ही गया साथ ही दूसरी ओर से दुर्भाग्य भी शुरू हो गया था। 
 
शाहजहां ने इस कोहिनूर हीरे को अपने मयूर सिंहासन में जड़वाया था लेकिन उनका विशाल साम्राज्य उनके ही क्रूर बेटे औरंगजेब के हाथ में चला गया। उनकी पसंदीदा पत्नी मुमताज का इंतकाल हो गया और उनके बेटे ने उन्हें उनके अपने महल में ही नजरबंद कर दिया। औरंगजेब जब तख्त पर बैठा तो उस हीरे का असर उस पर भी शुरू हो गया।
 
1739 में फारसी शासक नादिर शाह भारत आया और उसने मुगल सल्तनत पर आक्रमण कर दिया। इस तरह मुगल सल्तनत का पतन हो गया और नादिर शाह अपने साथ तख्त-ए-ताउस और कोहिनूर हीरे को फारस ले गया। उसने इस हीरे का नाम 'कोह-इ-नूर' रखा जिसका अर्थ होता है 'रोशनी का पहाड़'। इस हीरे के कारण ही नादिर शाह की हत्या हो गई। 
 
तुगलक वंश और काकतीय वंश भी बर्बाद हो गए...
 



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