जनतंत्र की सही परिभाषा समझने और समझाने वाले पं. नेहरू

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घटना अंकलेश्वर की है। उन दिनों वहाँ तेल की खोज के लिए अनेक कुएँ खोदे गए थे। एक कुएँ में से जब तेल की धारा फूट पड़ी तो सर्वत्र प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। तेल की यह धारा हमारे देश के उज्ज्वल भविष्य की प्रतीक थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू भी उस कुएँ को देखने के लिए अंकलेश्वर पहुँचे। इस तेल के कुछ धब्बे नेहरूजी की अचकन पर भी पड़ गए। अधिकारियों को चिंता हुई।

उन्होंने सलाह दी कि अचकन बदल ली जाए, मगर नेहरूजी ने उसकी कोई आवश्यकता नहीं समझी। इसके विपरीत उन्होंने बड़े गर्व से कहा- 'मैं तो तेल के धब्बोंवाली यही अचकन पहनकर संसद में जाऊँगा और वहाँ पर बतलाऊँगा कि ये धब्बे हमारे अपने देश में निकले तेल के हैं।'

ऐसे थे हमारे स्वतंत्र राष्ट्र के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, जिनमें राष्ट्रीयता और देश के प्रति अटूट निष्ठा कूट-कूट कर भरी हुई थी। राष्ट्र के साथ ही उनमें अपने राष्ट्रगान और राष्ट्र ध्वज के प्रति भी अपार श्रद्धा थी। किसी भी परिस्थिति में वे अपने राष्ट्र के इन प्रतीकों का अपमान सहन नहीं कर सकते थे। एक बार उन्हें किसी छोटे कस्बे में राष्ट्र ध्वज लहराना था। बेहद कड़ी धूप थी।

संयोगवश ध्वज की घिर्री में कुछ खराबी हो गई। उसे ठीक करने में कुछ वक्त लगा। लोगों ने सलाह दी कि जब तक घिर्री ठीक हो, पंडितजी एक ओर छाया में बैठकर आराम कर लें, मगर वे नहीं माने। वे वहीं पर तब तक खड़े रहे, जब तक कि घिर्री ठीक नहीं हो गई। इसके बाद उन्होंने ध्वजारोहण करके उसे सलामी दी और उसके बाद ही वे बैठे।
घटना अंकलेश्वर की है। उन दिनों वहाँ तेल की खोज के लिए अनेक कुएँ खोदे गए थे। एक कुएँ में से जब तेल की धारा फूट पड़ी तो सर्वत्र प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। तेल की यह धारा हमारे देश के उज्ज्वल भविष्य की प्रतीक थी।


नेहरूजी में मानवता भी कूट-कूट कर भरी हुई थी। अपने देश के नागरिकों का चारित्रिक पतन देखकर उन्हें सख्त अफसोस होता था। अनुचित और अमानवीय घटनाओं को देखकर या सुनकर उनकी आँखों में क्रोध की लालिमा छा जाती थी और पीड़ित लोगों को देखकर उनकी आँखें भर आती थीं। 1946-47 के सांप्रदायिक दंगों ने उनकी आँखों को अक्सर ही नम बनाए रखा।

नवंबर 1947 में वे जब अपनी कश्मीर यात्रा के समय बारमूला में गए तो वहाँ पाकिस्तानी तत्वों द्वारा जनता पर किए गए अत्याचारों के बारे में सुनकर उनकी आँखें भर आईं। लौटते समयएक स्थान से उन्होंने कुछ फूल चुनकर अपने पास रख लिए। जब नेहरूजी से यह पूछा गया कि वे इन फूलों का क्या करेंगे तो उन्होंने हृदयस्पर्शी भाव में बड़े दुःखी स्वर में उत्तर दिया- 'दिल्ली पहुँचकर मैं इन फूलों को पूज्य बापू के चरणों में भेंट चढ़ाकर कहूँगा कि बारामूलामें अब केवल इतनी ही सुंदरता और सभ्यता शेष रह गई है।'

प्रधानमंत्री के रूप में अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद नेहरूजी साधारण व्यक्तियों की या छोटी-छोटी बातों की भी उपेक्षा नहीं कर पाते थे। अपनी साठवीं वर्षगाँठ मनाने के लिए वे अमेरिका से सीधे मुंबई पहुँचे। अनेक अधिकारी और मित्र उनके स्वागत के लिए हवाई अड्डे पर मौजूद थे।

एक वृद्ध महिला अपने हाथ में आइस्क्रीम लिए हुए नेहरूजी के निकट पहुँचने की कोशिश में थी। वह नेहरूजी को आइस्क्रीम खिलाना चाहती थी। अधिकारियों ने उसे डाँट दिया। अचानक ही नेहरूजी की उस पर दृष्टि पड़ गई। उसका उद्देश्य जानकर वे सीधे उस महिला के पास पहुँच गए और उसके हाथ से आइस्क्रीम लेकर खाने लग गए। उपस्थित जन समुदाय आश्चर्यचकित रह गया और वह वृद्ध महिला प्रसन्नता से गद्गद् हो उठी।

पं. नेहरू जनतंत्रीय परंपराओं के प्रबल समर्थक थे। जनता की राय के सामने वे अपनी राय को कोई महत्व नहीं देते थे। अनावश्यक रूप से वे अपनी राय को दूसरों पर लादना भी अनुचित समझते थे। 1952 के चीनी आक्रमण के समय भारत को काफी हानि उठानी पड़ी थी। उस समय श्री कृष्ण मेनन हमारे रक्षामंत्री थे। इससे श्री कृष्ण मेनन के विरुद्ध देश में जनरोष काफी प्रबल था। नेहरूजी यह भलीभाँति जानते थे कि श्री कृष्ण मेनन न केवल निर्दोष हैं, बल्कि वे प्रबल राष्ट्रभक्त और कुशल प्रशासक भी हैं। इसलिए उन्होंने संसद में श्री कृष्ण मेनन की प्रशंसा की, लेकिन जनमत का आदर करते हुए उन्होंने श्री कृष्ण मेनन का त्यागपत्र स्वीकार भी कर लिया। स्वतंत्र भारत में यह जनतंत्र की पहली विजय थी

जनतंत्र के कट्टर समर्थन के साथ ही नेहरूजी अनुशासन के भी पक्के हिमायती थे। जनतंत्र की आड़ में अनुशासनहीनता को बर्दाश्त करना वे अनुचित मानते थे। एक बार जब नेहरूजी किसी सभा में भाषण दे रहे थे तो बरसात शुरू हो गई। लोग फिर भी सभा में जमे रहे। कुछ व्यक्तियोंने बरसात से बचने के लिए अपने-अपने छाते खोल लिए। इससे सभा में कुछ अव्यवस्था-सी उत्पन्न होने लगी।

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- योगेशचंद्र शर्मा
कुछ लोग छाते लेकर नेहरूजी की तरफ बढ़े ताकि उन्हें बरसात से बचाया जा सके। नेहरूजी ने अपने लिए छाते को अस्वीकार करते हुए कहा- 'एकता का महत्व बहुत अधिक होता है। कुछ लोग अपने छाते लगाए रहें और कुछ बरसात में भीगते रहें, यह कैसे उचित हो सकता है?' नेहरूजी के इन शब्दों को सुनकर लोगों ने तत्काल अपने छाते बंद कर दिए और बरसात में भीगते हुए ही भाषण सुनते रहे। इन्हीं सारे गुणों ने नेहरूजी को हमारे प्रथम प्रधानमंत्री तथा बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी के रूप में विश्व भर में ख्याति दिलाई।



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