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थिंक पॉजि‍टि‍व, गेट पॉजि‍टि‍व

- डॉ. मणि‍शंकर आचार्य

थिंक पॉजिटिव
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हमारे सोच वि‍चार के दो तरीके हैं एक पॉजि‍टि‍व और दूसरा नेगेटि‍व। पॉजि‍टि‍व सोच पर लाइफ की असल खुशी टि‍की होती है। अगर सोच नेगेटि‍व होगी तो लाख सुविधाएँ होने के बावजूद इंसान खुश नहीं रह सकता। अगर सोच पॉजि‍टि‍व होगी तो अभाव में भी वो सुखी रहेगा, सेटि‍स्‍फाय रहेगा और जिंदगी का लुफ्त उठा सकेगा। इसलि‍ए जिंदगी की सारी खुशी इस पर डि‍पेंड करती है कि‍ हम लाइफ को कैसे लेते हैं, उसे कैसे जीते हैं और हमारे सोचने-समझने का तरीका कैसा है।

हम देख रहे हैं कि देश आर्थिक समृद्धि की ओर बढ़ रहा है। लोगों को ढेर सारी सुख-सुविधाएँ भी मिली हुई हैं फिर भी वे दुखी हैं, संपन्नता में भी अभाव महसूस करते हैं, क्योंकि उनकी सोच नेगेटि‍व है। रोगी यदि दिन-रात अपने दुःख के बारे में ही सोचता रहेगा तो वह कभी भी स्वस्थ नहीं हो सकेगा।

इसके विपरीत यदि उसकी सोच पॉजि‍टि‍व होगी तो वह बीमारी में भी अच्‍छा लग सकता है तथा जल्दी स्वस्थ भी हो सकता है। यदि हम नेगेटि‍व सोच को अपने भीतर प्रवेश न करने दें तो अच्छा अनुभव कर सकते हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी सामान्य जीवन जी सकते हैं और दुःख-द्वंद्व की आग में जलने से भी बच सकते हैं।

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पॉजि‍टि‍व सोच वाला व्यक्ति जीवन-संघर्ष में हार नहीं मानता। उसे अपने आराध्य की कृपा का सहारा भी मिल जाता है, चाहिए उसके प्रति सच्ची श्रद्धा और विश्वास। नेगेटि‍व सोच रखना यानी आगे रहकर दुःख को निमंत्रित करना और जीवन को नर्क बना देना। इससे जीवन की यात्रा कठिन और बोझिल हो जाती है। अपने सुख-दुःख के लिए कोई अन्य नहीं बल्कि व्यक्ति स्वयं ही जिम्मेदार है।

कुछ लोग जीवन में सारे सुख होने के बावजूद दिन-रात अपने दुःख का रोना रोते रहते हैं। वे असंतोष की आग में जलते रहते हैं और तनाव में जीते हैं। और अधिक चाहिए... और अधिक... एक अंतहीन प्यास जिसका कोई अंत नहीं। यह प्यास हमारा रहा-सहा सुख भी छीन लेती है और जीवन दुःख-द्वंद्व की करुण दास्तान बन जाता है। अतएव यह आवश्यक है कि व्यक्ति केवल जीवन के अँधेरे के बारे में ही न सोचे बल्कि आने वाली सुबह का भी ध्यान रखे, जो द्वार पर दस्तक दे रही है।

पॉजि‍टि‍व सोच ही जीवन के सच्चे सुख, शांति, संतोष और आनंद का आधार है। नेगेटि‍व सोच वाले इंसान की लाइफ में रह जाती है केवल निराशा और असंतोष, जलन और तपन और आहें। नेगेटि‍व सोच जीवन का अभिशाप है, तो पॉजि‍टि‍व सोच वरदान।

इसलि‍ए जीवन के सुख के लिए नेगेटि‍व सोच की अँधेरी गली से निकलकर पॉजि‍टि‍व सोच के राजमार्ग पर चलना चाहिए। महाकवि जयशंकर प्रसाद ने अपने महाकाव्य 'कामायनी' में यही संदेश दिया है- 'औरों को हँसते देखो मनु, हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्मृत कर लो, सबको सुखी बनाओ।'
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