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क्या है भगवान बुद्ध का धर्म चक्र प्रवर्तन, जानिए

Updated: शनिवार, 24 जुलाई 2021 (13:19 IST)
गौतम बुद्ध जी को जब आत्म ज्ञान उपलब्ध हुआ तो उसके पश्चात उन्होंने सारनाथ में अपने पहले 5 शिष्यों को गुरु पूर्णिमा के‍ दिन धर्म के 8 सूत्र बताए जिन्हें अष्टांगिका कहा गया। आष्टांगिक अर्थात जीवन को सुधारने के 8 कदम। प्रारंभिक बौद्ध इसे 'काल चक्र' कहते रहे थे, अर्थात समय का चक्र। समय और कर्म का अटूट संबंध है। कर्म का चक्र समय के साथ सदा घूमता रहता है।
 
 
कालांतार में यही धर्म चक्र प्रवर्तन कहलाने लगा। बुद्ध के उपदेश देने के इस कार्य को ही धर्म चक्र के आरम्भ का अथवा प्रवर्तन का सूचक माना गया और इसे एक चक्र में आठ तीलियों के रूप में दर्शाया जाने लगा और इसे धर्मचक्र का नाम दिया गया। धम्मचक्र के आठ पहिए तथागत बुद्ध के बताए हुए अष्टांगिक मार्ग को दर्शाते हैं। बाद के अनुयायियों ने 24 आवश्यक गुण निर्धारित किए जैसे धैर्य, श्रद्धा, आत्म नियंत्रण आदि, इन्हें भी बाद के धर्मंचक्र में 24 आरियों के रूप में प्रतीक रूप दर्शाया जाने लगा। अशोक के प्रस्तर लेखों में भी धर्मचक्र है और अशोक स्तम्भ में यह चक्र 24 आरियों का है। इसे ही भारत के राष्ट्रीय ध्वज में अपनाया गया है।

बुद्ध ने जब ‘धर्म-चक्र प्रवर्तन’ किया तो इसका कोई संकेत नहीं दिया कि वह पहले की कोई परंपरा तोड़कर कोई नया मार्ग निर्मित कर रहे हैं। उन्होंने तो कहा- ‘एसो धम्मो सनंतनो’। अर्थात यही सनातन धर्म है, जिसे वे फिर से व्याख्‍यायित कर रहे हैं। 

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