अभिनेत्री और टेलीविजन होस्ट कुब्रा सैत फिटनेस की एक नई, संतुलित और सशक्त परिभाषा पेश करती हैं, जहां शरीर के वजन से कहीं अधिक महत्व मानसिक मजबूती और आत्म-जागरूकता है। बॉडी इमेज और मानसिक स्वास्थ्य पर अपनी बेबाक राय के लिए पहचानी जाने वाली कुब्रा का मानना है कि वेलनेस की असली शुरुआत मन से होती है और वहीं से शरीर तक उसका प्रभाव पहुंचता है।
एक विशेष बातचीत में कुब्रा ने साझा किया कि समय के साथ स्वास्थ्य को लेकर उनकी सोच कैसे बदली, उनकी ज़िंदगी में थेरेपी की भूमिका कितनी अहम रही और किस तरह अनुशासित जीवन ने उन्हें आज के तनावपूर्ण दौर में भी संतुलित बनाए रखा है।
अच्छा दिखने से ज़्यादा ज़रूरी है, अच्छा महसूस करना
कुब्रा के अनुसार, आधुनिक फिटनेस संस्कृति की सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग दिखावे पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं। वे कहती हैं, आज हम सभी जानकारियों से भरे फिटनेस हैक्स और ट्रेंड्स की बौछार में इस तरह घिरे हुए हैं, कि हमारा पूरा ध्यान केवल शरीर पर केंद्रित रहता है। हम यह भूल जाते हैं कि हर शरीर अलग होता है। खुद पर जो दबाव हम डालते हैं, वह अच्छा दिखने के लिए होता है, न कि सच में अच्छा महसूस करने के लिए। हालांकि मेरे लिए फिटनेस का मतलब है एक स्वस्थ मन।”
महामारी बनी वेलनेस जर्नी का निर्णायक मोड़
कोविड-19 का दौर कुब्रा की वेलनेस यात्रा में एक अहम मोड़ साबित हुआ। इसी दौरान उन्होंने समझा कि तनाव, हार्मोन और मानसिक स्वास्थ्य एक-दूसरे से कितनी गहराई से जुड़े हैं। वे बताती हैं, “कोविड के दौरान मुझे यह समझ आया कि किस तरह डोपामिन, एस्ट्रोजन, टेस्टोस्टेरोन और सेरोटोनिन जैसे रसायनों से भरा हुआ हमारा शरीर कैसे काम करता है, जिन्हें दिमाग नियंत्रित करता है।”
कुब्रा इस बात पर भी ज़ोर देती हैं कि तनाव केवल मानसिक स्थिति को ही नहीं, बल्कि सीधे तौर पर शारीरिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। उनके अनुसार, तनाव से कॉर्टिसोल बढ़ता है, और जब कॉर्टिसोल बढ़ता है, तो शरीर वज़न तक कम नहीं कर पाता। अगर मन मज़बूत नहीं है, तो सबसे पहला असर शरीर पर ही पड़ता है।
अनुशासन है असली कुंजी
काम का दबाव, आस-पास की चुनौतियाँ और रोज़मर्रा की भागदौड़ से भरी दुनिया में कुब्रा मानसिक अनुशासन को बेहद ज़रूरी मानती हैं। उनका वेलनेस मंत्र सरल लेकिन प्रभावशाली है। वह कहती हैं, स्वास्थ्य कोई मंज़िल नहीं, बल्कि रोज़ निभाई जाने वाली एक प्रक्रिया है। स्वस्थ महसूस करना इस बात से जुड़ा है कि आप अपनी ज़िंदगी में मानसिक और शारीरिक रूप से पूरी तरह उपस्थित रह सकें।
42 वर्ष की उम्र में कुब्रा न तो जवानी के पीछे भाग रही हैं और न ही किसी बाहरी स्वीकृति की तलाश में हैं। उन्होंने संतुलन, आत्मसम्मान और मानसिक दृढ़ता को चुना है। वे कहती हैं, 21वीं सदी में अगर हम अपने मन पर ध्यान दें और मन व शरीर, दोनों के साथ अनुशासित रहें, तो यही सही संतुलन है। हमारे आस-पास सब कुछ तनावपूर्ण है, फिर वो चाहे काम हो, माहौल हो, प्रदूषण हो या हमारे कमज़ोर और बुरे दिन। अगर मन मज़बूत नहीं है, तो उसका असर सबसे पहले शरीर पर पड़ता है।
असली फिटनेस भीतर से शुरू होती है
कुब्रा सैत का स्वास्थ्य के प्रति दृष्टिकोण यह याद दिलाता है कि सच्ची फिटनेस न उम्र से तय होती है, न शरीर के आकार से और न ही सामाजिक अपेक्षाओं से। इसकी असली पहचान है मानसिक संतुलन और भीतर की मज़बूती। दबाव के बजाय सजगता, ट्रेंड्स के बजाय अनुशासन और परिपूर्णता के बजाय आत्म-जागरूकता को अपनाते हुए, कुब्रा यह साबित करती हैं कि जब मन का ख़याल रखा जाए, तो शरीर स्वाभाविक रूप से उसका साथ देने लगता है।