प्रिया राजवंश और चेतन आनंद, ये दो नाम आज की पीढ़ी के लिए शायद अनजान हों। लेकिन देव आनंद को कौन नहीं जानता? वही सदाबहार अभिनेता, जिनकी मुस्कान ने दशकों तक परदे को रोशन रखा। चेतन आनंद उनके बड़े भाई थे। फिल्मी दुनिया के दरवाज़े देव आनंद के लिए सबसे पहले चेतन ने ही खोले। और चेतन के जीवन में जो नाम सबसे गहराई से दर्ज हुआ, वह था- प्रिया राजवंश।
दोनों साथ रहे। उम्र भर साथ रहे। विवाह नहीं किया। और शायद जरूरत भी नहीं समझी। बाहरी दुनिया उन्हें पति-पत्नी ही मानती रही, जैसे कभी वी. शांताराम और संध्या को लेकर धारणाएँ बनी थीं। यह रिश्ता परिभाषाओं से परे था। साथ था, विश्वास था, और एक लंबी साझी यात्रा थी।
शिमला से लंदन, फिर मुंबई
प्रिया का जन्म शिमला में हुआ। बचपन का नाम था वीरा। पिता सुंदर सिंह वन विभाग में कंजरवेटर थे। अनुशासन, सादगी और संस्कार, इन तीन शब्दों में उनका परिवेश समाया था।
स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई शिमला में हुई। पढ़ाई के साथ अंग्रेज़ी नाटकों में भागीदारी। मंच से लगाव यहीं पनपा। खूबसूरती तो जैसे प्रकृति ने फुर्सत से गढ़ी थी। तीखे नाक-नक्श, लंबा कद, घने बाल। उन्हें देखते ही अक्सर ग्रेटा गार्बो की याद ताजा हो जाती।
फिर समय बदला। पिता संयुक्त राष्ट्र संघ के एक कार्य से ब्रिटेन भेजे गए। प्रिया को दाखिला मिला लंदन की प्रतिष्ठित रॉयल एकेडेमी ऑफ ड्रामैटिक आर्ट में। अभिनय की औपचारिक शिक्षा। परफॉर्मिंग आर्ट की समझ। यही प्रशिक्षण आगे चलकर उनकी पहचान बना।
दिलचस्प यह कि उन्होंने फिल्मों में आने की कोई कोशिश नहीं की थी। किस्मत ने दस्तक दी। लंदन के एक फोटोग्राफर ने उनकी तस्वीर खींची। वह तस्वीर किसी तरह भारत पहुँची। चेतन आनंद ने एक मित्र के घर वह फोटो देखी और ठहर गए। उन्हें अपनी नई फिल्म के लिए एक नए चेहरे की तलाश थी।
20 अक्टूबर 1962। चीन ने भारत पर हमला किया। देश आहत था। इसी पृष्ठभूमि पर चेतन आनंद एक फिल्म बनाना चाहते थे 'हकीकत'। और उन्होंने प्रिया को अपनी नायिका चुन लिया।
सपना जो खुद चलकर आया
थिएटर करने वाली एक युवती। स्टार बनने का कोई घोषित सपना नहीं। लेकिन सपना खुद उनके दरवाज़े पर आया।
1964 में रिलीज़ हुई हकीकत हिंदी सिनेमा की पहली चर्चित युद्ध फिल्म मानी जाती है। फिल्म के निर्माण में प्रिया सिर्फ अभिनेत्री नहीं रहीं। संवाद, पटकथा, निर्देशन, हर स्तर पर उनकी भागीदारी रही। वह चेतन की रचनात्मक सहयोगी थीं, सिर्फ नायिका नहीं।
उन दिनों चेतन आनंद अपनी पत्नी उमा से अलग हो चुके थे। दो अकेले लोग मिले। साथ चलने का निर्णय लिया। उम्र में बाइस वर्ष का अंतर था। लेकिन रिश्तों की गहराई उम्र से नहीं मापी जाती। दोनों ने शादी नहीं की। फिर भी रिश्ता आख़िरी सांस तक निभा।
चेतन की हीर
हकीकत के बाद 1970 में आई हीर रांझा। यह फिल्म अपने आप में प्रयोग थी। संवाद गद्य में नहीं, पद्य में बोले गए। गीत और संवाद लिखे थे कैफी आज़मी ने। नायक थे राज कुमार, अपनी दमदार आवाज़ और व्यक्तित्व के साथ।
फिल्म सफल रही। और यह साफ़ हो गया कि प्रिया सिर्फ चेतन की नायिका नहीं, उनकी रचनात्मक प्रेरणा हैं।
बाहरी निर्माताओं के प्रस्ताव आए। लेकिन प्रिया ने किसी और के साथ काम नहीं किया। उनकी फिल्मोग्राफी छोटी रही- हिंदुस्तान की कसम, हँसते जख्म, साहेब बहादुर, कुदरत, हाथों की लकीरें। 1964 से 1986 तक का सफर।
सौंदर्य था। गरिमा थी। व्यवहार में संयम था। पहले दोनों एक ही घर में रहते थे। बाद में प्रिया ने अलग बंगला बनवाया। दिन में दो बार चेतन से मिलना। दोपहर का भोजन साथ। रात का डिनर साथ। कभी बहस। कभी नाराज़गी। फिर मेल-मिलाप। रिश्ता पूरी तरह जीवंत।
बंगला, विरासत और साज़िश
1997 में चेतन आनंद का निधन हुआ। प्रिया अकेली रह गईं। मुंबई का वह बंगला, जिसकी कीमत समय के साथ बढ़ती गई, अब लालच की वजह बन गया।
27 मार्च 2000। एक साजिश। चेतन आनंद की पहली पत्नी के बेटे केतन आनंद और विवेक आनंद, साथ में नौकर माला और अशोक। प्रिया की निर्मम हत्या कर दी गई। अदालत ने चारों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
एक सितारा बुझ गया। चुपचाप।
कुछ वर्ष बाद चेतन आनंद के जीवन पर एक पुस्तक प्रकाशित हुई। कई अध्याय थे। कई प्रसंग थे। लेकिन वह स्त्री, जो पहले पन्ने से आख़िरी पन्ने तक उनके साथ रही, उसका उल्लेख मुश्किल से मिलता है।
फिल्मी दुनिया चमकती बहुत है। लेकिन उसकी परछाइयाँ भी उतनी ही गहरी होती हैं। प्रिया राजवंश की कहानी उसी रोशनी और अंधेरे के बीच झिलमिलाती एक दास्तान है।