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Last Modified: रविवार, 12 अप्रैल 2026 (16:23 IST)

लता की छाया से बाहर, अपनी रोशनी में चमकीं आशा भोसले

Asha Bhosle Death
भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में अगर किसी आवाज ने अपनी बहुरंगी शैली से हर दौर को छुआ है, तो वह हैं आशा भोसले। उनकी गायकी सिर्फ सुरों का मेल नहीं, बल्कि भावनाओं का एक जीवंत विस्तार है। वे उन विरले कलाकारों में हैं जिन्होंने संगीत को सिर्फ निभाया नहीं, बल्कि उसे हर बार नए अंदाज़ में जिया। यही कारण है कि उनकी आवाज़ दशकों बाद भी उतनी ही ताज़ा और असरदार लगती है।
 
आशा भोसले की सबसे बड़ी खासियत उनकी अद्भुत बहुमुखी प्रतिभा रही। जहां उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर को शास्त्रीयता और कोमल भावों की प्रतीक माना गया, वहीं आशा जी ने हर उस शैली को अपनाया, जिसे उस समय जोखिम भरा समझा जाता था।
 
उन्होंने कैबरे, पॉप, वेस्टर्न, ग़ज़ल और लोकधुनों तक में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा। ‘दम मारो दम’ जैसे बिंदास गीतों में उनकी बेफिक्री झलकती है, तो ‘इन आंखों की मस्ती के’ में उनकी आवाज़ की नजाकत श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती है। उनकी गायकी में एक खास तरह की चुलबुलाहट, ऊर्जा और अभिव्यक्ति की ताकत है, जो हर गीत को जीवंत बना देती है।
 
लेकिन इस चमक के पीछे संघर्ष की एक लंबी कहानी भी छिपी है। कम उम्र में ही घर छोड़कर विवाह करना, फिर वैवाहिक जीवन में असफलता, और आर्थिक मुश्किलों का सामना, इन सबने आशा भोसले को भीतर से मजबूत बनाया।
 
जब वे संगीत की दुनिया में अपनी जगह बनाने आईं, तब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी अपनी बहन की विराट छवि से अलग पहचान बनाना। शुरुआती दौर में उन्हें अक्सर छोटे बजट की फिल्मों और बी-ग्रेड प्रोजेक्ट्स के लिए गाने पड़े। कई बार उनकी प्रतिभा को नजरअंदाज भी किया गया, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
 
उनके करियर में एक बड़ा मोड़ तब आया जब उनकी मुलाकात संगीतकार आर. डी. बर्मन से हुई। यह जोड़ी सिर्फ पेशेवर नहीं, बल्कि रचनात्मक रूप से भी बेहद खास थी। आर. डी. बर्मन के प्रयोगधर्मी संगीत और आशा भोसले की लचीली आवाज़ ने मिलकर हिंदी फिल्म संगीत को एक नया रंग दिया। ‘पिया तू अब तो आजा’, ‘दम मारो दम’, ‘महबूबा महबूबा’ जैसे गीतों ने उन्हें युवाओं की आवाज़ बना दिया, वहीं ‘मेरा कुछ सामान’ जैसे गीतों में उनकी गहराई भी सामने आई।
 
अगर उनके चुनिंदा गीतों पर नजर डालें, तो ‘उड़े जब-जब जुल्फें तेरी’, ‘ओ हसीना ज़ुल्फों वाली’, ‘इन आंखों की मस्ती के’, ‘दिल चीज़ क्या है’, ‘मेरा कुछ सामान’ और ‘राधा कैसे न जले’ जैसे गीत उनकी बहुमुखी प्रतिभा के उदाहरण हैं।
 
हर गीत में वे सिर्फ गाती नहीं, बल्कि अभिनय भी करती हैं, आवाज़ के जरिए भावों को इस तरह व्यक्त करती हैं कि श्रोता खुद को उस स्थिति में महसूस करने लगता है।
 
आशा भोसले की प्रसिद्धि का सबसे बड़ा कारण उनका साहस और निरंतर प्रयोग करने की क्षमता है। उन्होंने कभी खुद को एक दायरे में सीमित नहीं किया। बदलते समय के साथ उन्होंने अपनी शैली को भी बदला और हर पीढ़ी के साथ जुड़ी रहीं। यही वजह है कि वे सिर्फ एक गायिका नहीं, बल्कि एक प्रेरणा हैं, यह प्रेरणा कि अगर आत्मविश्वास और मेहनत हो, तो किसी भी छाया से बाहर निकलकर अपनी अलग रोशनी बनाई जा सकती है।
 
लेखक के बारे में
समय ताम्रकर
समय ताम्रकर फिल्म समीक्षक हैं, जो फिल्म, कलाकार, निर्देशक, बॉक्स ऑफिस और फिल्मों से जुड़े पहलुओं पर गहन विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं।.... और पढ़ें
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