शाइनी के अभिनय से पिघलती अदालत
IFM
अपने तमाम मेडिकल ज्ञान के बावजूद जेल के डॉक्टरों ने असली और नकली बीमार पहचानने का अलग तरीका खोज रखा है। तरीका यह है कि जो अस्पताल में भर्ती होने के लिए तगड़ी और तयशुदा रिश्वत दे, वो बीमार। जो नहीं दे या नहीं दे सके, वो स्वस्थ। जो आदमी बीमार होने के बावजूद जेल के डॉक्टरों को रिश्वत न दे सके, वो महत्वहीन आदमी है। ऐसा आदमी जेल में मर भी जाए तो कोई हंगामा नहीं होता है। ऐसे आदमी को अस्पताल में भर्ती करके क्यों भीड़-भाड़ बढ़ाना? जो आदमी पैसे दे सकता है उसके लिए जेल का माहौल ठीक नहीं। जो जेल में रहे तो बीमार हो सकता है, इसलिए उसे किसी भी झूठी-सच्ची बीमारी के बहाने, आराम के लिए अस्पताल भेजा जा सकता है।
सवाल यह है कि फिर सलमान खान को, संजय दत्त को, शाइनी आहूजा को क्यों अस्पताल में भर्ती नहीं कराया जाता, जबकि बीमार की एक्टिंग में ये ज्यादा माहिर हैं। जवाब है मीडिया का अटेंशन। अगर जेल का डॉक्टर शाइनी आहूजा जैसे चर्चित आदमी से पैसे लेकर उसे अस्पताल पहुँचा दे और मीडिया यह छापे कि अस्पताल में शाइनी आहूजा जायकेदार पकवान उड़ा रहे हैं, मनचाहा पेय पी रहे हैं, तो डॉक्टर की छुट्टी हो सकती है। नेताओं को इसलिए बीमार करार देना पड़ता है, क्योंकि पॉलिटिकल प्रेशर रहता है। आज जेल में आने वाला कल मंत्री भी बन सकता है। ये हीरो-वीरो क्या कर सकते हैं?
जिस बुनियाद पर शाइनी को अब जमानत मिली है, कुछ समय पहले भी मिल सकती थी। मगर न्यायतंत्र मानवीय हाथों में है। कुछ दिन आरोपी भले ही विचाराधीन कैदी के रूप में जेल काट ले, सबको लगता है कि इसे उसके किए की "सजा" मिली है। बीमारी के अभिनय से जेल के डॉक्टर भले ही नहीं पिघले, पर अदालत की सहानुभूति शाइनी को मिल गई है। सजा उन्हें होगी या नहीं, यह वक्त बताएगा। मगर इस झंझट से पूरी तरह मुक्ति होने के बाद बहुत सारे नकारात्मक रोल उनका इंतजार करेंगे।

