रीत पश्चिमी, भावना देसी...
WD
फिल्मों और फिल्मी सितारों द्वारा हमें बहुत से जीवनमूल्य मिलते हैं, बहुत-सी रस्में मिलती हैं। जन्मदिन पर केक काटने का आइडिया हमें फिल्मों से मिला है। देश के तमाम बेकरी वालों को फिल्मों का अहसानमंद होना चाहिए। वेलेंटाइन डे मनाने का सुझाव भी हमारे युवाओं को फिल्मों से ही प्राप्त हुआ और परवान चढ़ा है। बीमार से खुद मिलने जाने की बजाय कार्ड भेजने का आइडिया "लगे रहो मुन्नाभाई" ने अभी हाल ही में दिया है।
हमारे यहाँ सगाई में पहले फल-फूल और मिठाइयों का लेन-देन होता था। फिर फिल्मवालों के कारण अँगूठी महत्वपूर्ण हो गई। जो हैसियत वाले हैं वे हीरे की अँगूठी देते हैं। इसकी शुरुआत अमेरिका से हुई। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हालात ऐसे बने कि अमेरिकियों के पास बहुत पैसा हो गया। इसी समय हीरे के गहने बनाने वाली एक कंपनी ने विज्ञापन तैयार किया और कहा कि लड़का अगर लड़की को प्रपोज कर रहा है, तो उसे हीरे की अँगूठी दें। पश्चिम में यही प्रपोज करना सगाई की हैसियत रखता है। इसका एक पहलू यह है कि लड़की यदि वाकई लड़के से शादी करना चाहती होगी, तो इतना महँगा तोहफा कबूल करेगी, वरना मना कर देगी। मुमकिन है कि कई लड़कियों ने खूबसूरत महँगी अँगूठी के कारण हाँ कर दी हो।
इस विज्ञापन की पंचलाइन थी- हीरा हमेशा के लिए है। छिपा हुआ संदेश यह था कि जिस तरह कुछ रिश्ते जिंदगीभर साथ निभाते हैं, उसी तरह हीरा भी हमेशा जस का तस बना रहता है। पूरब हो या पश्चिम, टिकाऊ विवाह सभी की आकांक्षा रही है। सो, सगाई में अँगूठी देना पश्चिमी रीत होते हुए भी हमारे समाज और संस्कृति से अलग नहीं है।
कुछ जानकार कहते हैं कि पूरी दुनिया में एक जैसी संस्कृति पनप रही है और अच्छी बात यह है कि पूरी दुनिया एक जैसी हो रही है। पूरी दुनिया जीन्स पहनती है, पूरी दुनिया जन्मदिन पर केक काट रही है। पूरी दुनिया कोक पी रही है और सगाई में हीरे की अँगूठी दे रही है, तो इसमें गलत क्या है? कोई भी संस्कृति सदा कायम नहीं रहती। संस्कृतियाँ मिटती-बनती रहती हैं। यही सनातन नियम है।
