जरूरत असली चोर की है
कैरेक्टर में घुसना किसे कहते हैं? कैरेक्टर में घुसना यानी बाहर भीतर से उस जैसे हो जाना जिस आदमी का रोल किया जा रहा हो। मिसाल के तौर पर एके हंगल का वो शोले वाला रोल। हंगल उस ज़मीन पर पैदा हुए जो अब इत्तफाक से पाकिस्तान में है। हंगल ने बचपन से बहुत ऐसे नमाज़ियों को देखा होगा, जो किसी भी तरह की मज़हबी कट्टरता से दूर रहते हुए पाबंदी से पाँचों नमाज़ पढ़ते हैं और ईश्वर में अटूट यकीन रखते हैं।
शोले में हंगल ने ऐसे बूढ़े का किरदार साकार किया है, जिसका बदन ही नमाज़ी नहीं, आत्मा भी नमाज़ी हो चुकी है। बिना ऐसे लोगों को ऑब्जर्व किए इस तरह का रोल नहीं किया जा सकता। ऑब्जर्व करने के लिए अभिनेताओं को नमाज़ी आसानी से मिल सकते हैं, पर चोर नहीं मिलते।
चोर जब तक सींखचों के पीछे न हो, कोई उसे पहचान नहीं सकता। मगर हवालात में चोर मासूम आदमी का अभिनय कर रहा होता है या फिर ऐसे आदमी का जिसे बेवजह खूब पीटा गया हो। यही वजह है कि हमारी फिल्मों में चोर का किरदार बहुत तगड़ा नहीं होता। निर्देशक एकाध प्रसंग में समझा देता है कि हीरो चोर है और बात खत्म हो जाती है।
हमें मानना पड़ता है कि क्योंकि हमने असल चोर को बमुश्किल ही देखा है। हमें नहीं पता कि चोरों का मैनेरिज़्म क्या होता है। संभव है अब हमें एक कायदे का चोर देखने को मिल जाए। कारण यह है कि "ए वेडनसडे" के निर्देशक नीरज पांडे अब एक फिल्म बना रहे हैं जो मुंबई में ज्वेलरी की दुकान में हुई एक डकैती पर आधारित है।
नीरज पांडे ने जिन बारीक तफसीलों के साथ "ए वेडनसडे" बनाई थी, उससे अंदाजा होता है कि वे अपनी इस फिल्म में चोर (अथवा डकैत) के किरदार पर खूब मेहनत करेंगे। अक्षय कुमार के सामने ये चुनौती रहेगी कि वे अपनी खास अदाएँ छोड़कर रोल में घुसें।
हमारी कई फिल्मों में हीरो को महान चोर दिखाया गया है। मगर लगभग हर बार हमारा हीरो हातिमताई होता है। अमीरों को लूटकर गरीबों में बाँट देता है। सिनेमाघर के अँधेरे में हमारे दर्शक महसूस करते हैं कि ये हीरो चोर तो है, पर गाँधी से कुछ कम ही महान है। वे उसे पूजने लगते हैं।
तीसमार खाँ का हीरो हातिमताई का विलोम था। मगर दिवाकर बैनर्जी की फिल्म "ओए लकी लकी ओए" में पहली बार चोर हीरो जरा दूसरे ढंग का था। ये चोर महान नहीं था। न ही चोर बनने की प्रेरणा पेट में मुद्दत से सुलग रही भूख और बीमार माँ की दवा थी। दूसरे ही कारण थे जिनके लिए लकी चोर बना था।
जिस चोर के जीवन पर "ओए लकी" आधारित थी, उसका नाम है बंटी चोर। "बिग बॉस" वाले उसे उल्टी पट्टी पढ़ाकर एक बार बिग बॉस के घर में ले ज़रूर आए थे, पर वो टिका नहीं। काश कि बंटी बिग बॉस के घर में टिके रहता। लोगों को कमसे कम पता तो चलता कि असल चोर होते क्या हैं। लोगों से ज्यादा अभिनय के विद्यार्थियों को। जिस तरह चित्रकला के विद्यार्थी मॉडल को सामने बैठा कर हाथ साफ करते हैं, उसी तरह अभिनय सीखने वालों के लिए भी तरह-तरह के असल किरदार मॉडल ही होते हैं।
अक्षय कुमार ने यदि वही सब किया अथवा फिल्म में वह सब भरने की जद की, जो उनकी पहचान है, तो बात बिगड़ जाएगी। इस बार दर्शकों को उनसे कुछ और की अपेक्षा है।
शोले में हंगल ने ऐसे बूढ़े का किरदार साकार किया है, जिसका बदन ही नमाज़ी नहीं, आत्मा भी नमाज़ी हो चुकी है। बिना ऐसे लोगों को ऑब्जर्व किए इस तरह का रोल नहीं किया जा सकता। ऑब्जर्व करने के लिए अभिनेताओं को नमाज़ी आसानी से मिल सकते हैं, पर चोर नहीं मिलते।
चोर जब तक सींखचों के पीछे न हो, कोई उसे पहचान नहीं सकता। मगर हवालात में चोर मासूम आदमी का अभिनय कर रहा होता है या फिर ऐसे आदमी का जिसे बेवजह खूब पीटा गया हो। यही वजह है कि हमारी फिल्मों में चोर का किरदार बहुत तगड़ा नहीं होता। निर्देशक एकाध प्रसंग में समझा देता है कि हीरो चोर है और बात खत्म हो जाती है।
हमें मानना पड़ता है कि क्योंकि हमने असल चोर को बमुश्किल ही देखा है। हमें नहीं पता कि चोरों का मैनेरिज़्म क्या होता है। संभव है अब हमें एक कायदे का चोर देखने को मिल जाए। कारण यह है कि "ए वेडनसडे" के निर्देशक नीरज पांडे अब एक फिल्म बना रहे हैं जो मुंबई में ज्वेलरी की दुकान में हुई एक डकैती पर आधारित है।
नीरज पांडे ने जिन बारीक तफसीलों के साथ "ए वेडनसडे" बनाई थी, उससे अंदाजा होता है कि वे अपनी इस फिल्म में चोर (अथवा डकैत) के किरदार पर खूब मेहनत करेंगे। अक्षय कुमार के सामने ये चुनौती रहेगी कि वे अपनी खास अदाएँ छोड़कर रोल में घुसें।
हमारी कई फिल्मों में हीरो को महान चोर दिखाया गया है। मगर लगभग हर बार हमारा हीरो हातिमताई होता है। अमीरों को लूटकर गरीबों में बाँट देता है। सिनेमाघर के अँधेरे में हमारे दर्शक महसूस करते हैं कि ये हीरो चोर तो है, पर गाँधी से कुछ कम ही महान है। वे उसे पूजने लगते हैं।
तीसमार खाँ का हीरो हातिमताई का विलोम था। मगर दिवाकर बैनर्जी की फिल्म "ओए लकी लकी ओए" में पहली बार चोर हीरो जरा दूसरे ढंग का था। ये चोर महान नहीं था। न ही चोर बनने की प्रेरणा पेट में मुद्दत से सुलग रही भूख और बीमार माँ की दवा थी। दूसरे ही कारण थे जिनके लिए लकी चोर बना था।
जिस चोर के जीवन पर "ओए लकी" आधारित थी, उसका नाम है बंटी चोर। "बिग बॉस" वाले उसे उल्टी पट्टी पढ़ाकर एक बार बिग बॉस के घर में ले ज़रूर आए थे, पर वो टिका नहीं। काश कि बंटी बिग बॉस के घर में टिके रहता। लोगों को कमसे कम पता तो चलता कि असल चोर होते क्या हैं। लोगों से ज्यादा अभिनय के विद्यार्थियों को। जिस तरह चित्रकला के विद्यार्थी मॉडल को सामने बैठा कर हाथ साफ करते हैं, उसी तरह अभिनय सीखने वालों के लिए भी तरह-तरह के असल किरदार मॉडल ही होते हैं।
अक्षय कुमार ने यदि वही सब किया अथवा फिल्म में वह सब भरने की जद की, जो उनकी पहचान है, तो बात बिगड़ जाएगी। इस बार दर्शकों को उनसे कुछ और की अपेक्षा है।
