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''परेशानी बढ़ाएगा पहचान-पत्र''

दिल्ली पहचान-पत्र प्रशांत भूषण
BBCBBC
दिल्ली में पहचान का कोई कागज साथ लेकर चलने के फैसले से कोई सुरक्षा नहीं बढ़ेगी। अगर कोई चरमपंथी दिल्ली आता है और उसको ये पता है कि यहाँ पर पहचान-पत्र देखे जाते हैं तो वो कोई फर्जी पहचान-पत्र बनवाकर आ सकता है। ऐसा करना उसके लिए बहुत कठिन नहीं होगा।

इस तरह के कदम से आप चरमपंथ को नहीं रोक पाएँगे। इसका असर यह होगा कि दिल्ली में आम लोगों से पुलिस वाले पैसे ऐंठने लगेंगे। दूर-दराज के इलाकों से काम के लिए दिल्ली आने वाले गरीबों के पास कोई कागज नहीं होता है, कोई पहचान-पत्र नहीं होता है, राशन कार्ड भी नहीं होता है।

हिंदुस्तान में आज आधी आबादी ऐसी है जिसके पास कोई पहचान पत्र नहीं है। उन लोगों को पुलिस जब-तब परेशान करेगी और उन्हें धमकी देकर पैसे ऐंठ लेगी।

पहचान-पत्र का विचार उन लोगों के दिमाग की उपज है, जो हवामहल में रहते हैं। जिनका आम लोगों से कोई रिश्ता-नाता नहीं है। उनको कोई समझ नहीं है कि आम लोगों की क्या मुश्किलें हैं।

मानसिकता का सवाल : ये लोग इस बात पर भी गहराई से नहीं सोचते कि इससे सुरक्षा कैसे बढ़ेगी। ये बात ऐसे ही लोगों ने या फिर दिल्ली पुलिस के भ्रष्ट अधिकारियों ने चलाई होगी क्योंकि इससे उनको खूब फायदा होगा।

एक गणतांत्रिक देश में किसी राज्य से जारी हुआ कोई भी कागजात सभी राज्य में मान्य होना चाहिए। अगर कोई राज्य दूसरे राज्य के पहचान-पत्र को स्वीकार नहीं करता है तो यह बिल्कुल ग़लत है।

कई राज्यों ने कानून बना दिया है कि उनके यहाँ बाहर के लोग आकर जमीन नहीं खरीद सकते हैं, मेरी समझ में वो भी गलत है। अब अगर उपराज्यपाल ने ऐसा आदेश जारी किया है तो इससे लोगों की परेशानी और बढ़ेगी। इस आदेश को कानूनी तौर पर चुनौती दी जा सकती है।

पर चिंता की बात यह है कि जब हमारे सत्ता प्रतिष्ठान में बैठे लोगों की मानसिकता ही ऐसी होती जा रही है कि आम लोगों की परेशानी को बिल्कुल नजरअंदाज करके सिर्फ संभ्रांत और संपन्न लोगों के लिए सोचा जाए तो फिर ऐसा ही होगा।
(बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद से बातचीत पर आधारित)