घरेलू हिंसा की आपबीती...
BBC
आंख के पास जहां उसने मारा था वहां नीला पड़ गया है। हाथ और पैर पर भी जहां उसने मारे थे, वहां निशान अभी भी बने हुए हैं। स्थिति ये है कि अभी भी मैं अपने दफ्तर जा रही हूं तो गले पर स्कार्फ लगाए बिना घर से बाहर नहीं निकल सकती।
वैश्विक समस्या : संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में हर दस में से छह औरतों की यही कहानी है जो कि उन्हें घरेलू हिंसा की वजह से उनके पति या फिर उनके साथी की वजह से झेलनी पड़ती है।
और बात अगर भारत की करें तो यहां की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं है। भारत में करीब 37 प्रतिशत महिलाएं अपने पतियों की वजह से घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। ये आंकड़े भारत सरकार के भारतीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के हैं।
जबकि घरेलू हिंसा के लिए लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि वास्तव में ये आंकड़े और ज्यादा हो सकते हैं। तमाम जागरूकता और कानूनों के बावजूद आज भी स्थिति ये है कि बहुत सी औरतें घरेलू हिंसा के खिलाफ मुंह खोलने से बचती हैं।
महिलाओं के अधिकारों के मुद्दे पर पिछले तीन साल के अपने रिपोर्टिंग अनुभव के आधार पर मैं कह सकती हूं कि मैंने इस तरह की तमाम घटनाओं को देखा है जो कि पुरुष प्रधान समाज में महिलाएं झेलती हैं।
चाहे कन्या भ्रूण हत्या का मामला हो, या दहेज के लिए ससुराल में प्रताड़ना हो या फिर सम्मान की खातिर की जाने वाली हत्याएं हों, हर जगह नियमों और कानूनों को तोड़ा जाता है। मैंने उत्तरी भारत के तमाम गांवों का दौरा किया जहां वो अपना दर्द अपने भीतर छिपाए रखती हैं।
चुप्पी : मैंने कई स्वास्थ्य कर्मियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सरकारी अधिकारियों से तमाम मुद्दों पर बातचीत की कि इन सबके पीछे आखिर वजह क्या है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक करीब 51 प्रतिशत पुरुष और 54 प्रतिशत महिलाएं पुरुषों द्वारा महिलाओं को पीटने को न्यायसंगत ठहराती हैं।
जाहिर है, लोगों की यही चुप्पी और धारणा घरेलू हिंसा को इस कदर बढ़ावा देने के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। साक्षात्कार के दौरान घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं ने ये भी बताया कि उनके परिवार वालों को इसकी जानकारी कैसे हुई और सब कुछ जानने के बावजूद किसी ने कुछ नहीं किया।
लेकिन मेरी समझ में ये बात आ रही है कि लोगों की इस चुप्पी की वजह क्या है। जानकारों का कहना है कि भारत में महिलाओं के प्रति होने वाली घरेलू हिंसा के पीछे तमाम वजहें हैं और इनकी जड़ें बहुत गहरी हैं।
इसके लिए गरीबी, साक्षरता, लैंगिंक भेदभाव से संबंधित कानूनों की कमी और सशक्तिकरण की दिशा में महिलाओं द्वारा की गई कुछ कोशिशों भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं। यहां तक कि भारत में कामकाजी महिलाएं भी घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं और वो भी इसके खिलाफ आवाज उठाने से बचती हैं।
(घरेलू हिंसा की शिकार पत्रकार नीता भल्ला की कहानी, उन्हीं की जुबानी)

