कौन असली, कौन नकली...
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निकोला उन दो बच्चियों में से एक है जो नौ दिसंबर 2007 को अपना पहला जन्मदिन मनाएगी लेकिन इसके साथ एक खबर भी जुड़ गई है, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि यह खबर सुखद या दुखद।
इस मामले की दास्तान ये है कि नौ दिसंबर 2006 को चेक गणराज्य के ट्रेबिक शहर के एक अस्पताल में दो महिलाओं ने अपनी-अपनी औलाद को जन्म दिया जो बच्चियाँ थीं। यह शहर राजधानी प्राग से लगभग 165 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में है।
वे अपनी-अपनी बच्चियों को घर लाकर उन्हें पालने-पोसने लगे और खुद को धन्य समझते थे मगर अचानक उन्हें एक अजीब खबर मिली कि जिस नन्ही-सी जान को वे अपना अंश समझकर उसकी परवरिश कर रहे हैं, वह उनका अपना खून नहीं है।
दरअसल इन दोनों में से एक बच्ची के पिता के बाल और आँखें काले हैं, लेकिन उनकी बेटी के बाल और आँखें उनसे नहीं मिलती थीं। पिता को शक हुआ तो उन्होंने अपनी जीवन संगिनी से यह बात कह डाली।
तय हुआ कि बच्ची का डीएनए टेस्ट कराया जाए और अचरज की बात ये कि उस टेस्ट में पता चला कि उनमें से किसी का भी आनुवंशिक संबंध अपनी बच्ची से नहीं था।
बस, यहाँ से मुद्दा अस्पताल में पहुँचा और लंबी जद्दोजहद के बाद पता चला कि निकोला और वेरोनिका नामक बच्चियाँ दरअसल आपस में बदल दी गई थीं और अपने असली माँ-बाप के बजाय एक दूसरे के माँ-बाप के पास चली गई थीं।
खैर, अस्पताल ने तो इस मामले को गंभीरता से लिया और दो नर्सों को नौकरी से निकाल दिया और पाँच अन्य कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की गई।
कौन-किसका खून : जब उन बच्चियों के माता-पिता को सच्चाई का पता चला तो उन्हें इस बात के लिए खुद को तैयार करने में ही खासा समय लगा कि जिसे वे अपनी औलाद समझ रहे थे वह उनकी औलाद नहीं है और उनकी औलाद को कोई और पाल रहा था।
लेकिन उन्होंने खुद को यह समझाने में देरी नहीं की कि और ज्यादा समय गुजरने से पहले ही अपनी-अपनी बच्चियों को अपना लिया जाए। हालाँकि इस बातचीत में कई सप्ताह का समय लग गया।
सलाह-मशविरे का सिलसिला शुरू हुआ और मनोवैज्ञानिकों ने कहा कि अगर बच्चियों को उनके माँ-बाप के पास पहुँचाने में और ज्यादा समय लगा तो मुश्किल हो सकती है क्योंकि बच्चियाँ अपने आसपास के माहौल को समझने और उसमें रमने लगी हैं।
तैयारियाँ शुरू हुईं तो दोनों बच्चियों के माता-पिता ने मनोवैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और की मदद ली और आपस में भी कई मुलाकातें कीं।
पहले योजना बनाई गई कि बच्चियों को साल 2008 शुरू होने पर उनके असली माँ-बाप के पास पहुँचाया जाएगा, लेकिन डॉक्टरों ने सलाह दी कि बच्चियाँ अपने पालने वाले अभिभावकों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ने लगी हैं।
इस सब जद्दोजहद के बाद अब तय हो गया है कि बच्चियाँ नौ दिसंबर 2007 को अपना पहला जन्म दिन अपने असली माँ-बाप के साथ मनाएँगी।

