कविता : स्वयं गढ़ना है मुझे
जयति शर्मा | सोमवार,जनवरी 16,2017
स्वयं गढ़ना है मुझे हाथों में अपनी सुरेखाएं,भूल कर अवसाद तय करना है प्रगति की दिशाएं, कामना है मन में और मस्तिष्क में वह ...
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