Third World War : आज समूचा जगत तृतीय विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ा है। अमेरिका-इजराइल के गठजोड़ द्वारा ईरान पर सामरिक हमला किए जाने से विश्वयुद्ध का खतरा मंडराने लगा है। संसार के देश खेमेबाजी करते दिखाई दे रहे हैं। आज आम जनमानस के मन में एक ही यक्ष प्रश्न मुंहबाए खड़ा है कि आखिर यह युद्ध किस सीमा तक बढ़ेगा और इसकी कब समाप्ति कब होगी?
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यदि ज्योतिष के संदर्भ में हम इस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयत्न करें तो सर्वप्रथम हमें उन ज्योतिषीय ग्रह-स्थितियों का विश्लेषण करना होगा, जो इस युद्ध के लिए उत्तरदायी हैं।
आजकल समाचार पत्रों, टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर किए जा रहे ईरान-अमेरिका युद्ध के विश्लेषण में अधिकांश ज्योतिषाचार्य इसके लिए गोचरवश बन रहे रहे 'अंगारक-योग' को आधार बनाकर अपनी ज्योतिषीय गणनाएं प्रस्तुत कर रहे हैं।
'अंगारक योग' मंगल व राहु की युति से बनता है और निर्विवाद रूप से यह एक अत्यंत अशुभ योग है लेकिन क्या यह अशुभ योग ईरान के संदर्भ में भी बन रहा है?
इस अति-महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर किसी भी विद्वान ने आज तक कोई चर्चा नहीं की है। जब हम ईरान पर हुए हमले के विषय में विचार कर रहे हैं तो हमें ईरान के संदर्भ में ग्रह-गोचर की गणना और उनसे बने शुभाशुभ योगों के बारे में विचार करना होगा ना कि भारत के संदर्भ में।
ईरान पर हुए हमले के समय के आधार हम जब ग्रह गोचर की गणना करते हैं तो पाते हैं कि वहां 'अंगारक योग' अनुपस्थित है क्योंकि ईरान के संदर्भ में ग्रह-गोचर में राहु-मंगल की युति नहीं है। ईरान की ग्रह-गोचर कुंडली में राहु तीसरे भाव में कुभ राशि में स्थित है और मंगल दूसरे भाव में मकर राशि में स्थित है। इससे यह तो स्पष्ट है कि ईरान पर हुए हमले में 'अंगारक योग' का कोई भी योगदान नहीं है।
यहां विशेष बात यह है कि लग्नेश कुंडली का सर्वाधिक प्रमुख ग्रह होता है और ईरान के संदर्भ में इस लग्नेश पर तृतीयेश राहु की दृष्टि है जो ईरान पर हुए हमले का प्रमुख कारक है।
दूसरा प्रमुख कारक ग्रह है- शनि। शनि दूसरे अर्थात् मारक भाव का अधिपति होने से मारकेश है। राहु के शनि की ही दूसरी राशि कुम्भ में स्थित होने से शनि और राहु का संयोग बना हुआ जो अत्यंत क्रूर एवं विध्वंसक है।
यहां शनि अपने नैसर्गिक क्रूर स्वभाव के अतिरिक्त राहु के क्रूर स्वभाव का प्रभाव भी अपने में समाहित कर दुगुनी क्रूरता और मारकता प्रभाव वाला ग्रह बन गया है।
अब जब हम इस अत्यंत क्रूर एवं मारक ग्रह के दृष्टि प्रभाव का विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि शनि चतुर्थ भाव में स्थित होने के कारण तीसरी दृष्टि से षष्ठ अर्थात् शत्रु भाव को, सप्तम दृष्टि से दशम अर्थात् राज्यसत्ता वाले भाव को एवं दशम दृष्टि से लग्न को देख रहा है। शनि की यह तीनों दृष्टियां ही वास्तविक रूप में इस युद्ध के लिए उत्तरदायी हैं, क्योंकि शनि को नैसर्गिक रूप से राज्य सत्ता और दंड का प्रतीक माना जाता है।
कुंडली का छठा भाव दुश्मनी, दशम भाव राज्यसत्ता और लग्न संपूर्ण व्यक्तित्व व जीवन का प्रतीक होता है। इन तीनों प्रमुख भावों के अशुभ एवं क्रूर मारक शनि के प्रभाव में आ जाने से ईरान पर हमला हुआ और युद्ध की शुरूआत हुई। अब एक और मारक तथ्य पर विचार करें तो पाएंगे कि लग्न पर शनि के अतिरिक्त केतु का भी मारणात्मक प्रभाव है जिसके चलते ईरान के सर्वोच्च नेता और राज्यसत्ता में बैठे अधिकांश प्रमुख व्यक्तियों की मृत्यु हुई।
अब दशाओं का विश्लेषण करते हैं, ईरान पर हमला सूर्य की महादशा में हुआ है जो कि मंगल के साथ दूसरे अर्थात् मारक भाव में स्थित है एवं सूर्य की राशि में केतु होने के कारण सूर्य की दशा केतु का मारणात्मक प्रभाव वाली दशा हुई। यह अशुभ दशा 21 जून 2026 तक प्रभावशाली रहेगी इसके बाद 21 जून 2026 से चन्द्रमा की दशा प्रभावशील होगी जो कि अष्टमेश है। अष्टमेश कुंडली का सर्वाधिक अशुभ ग्रह होता है, यह दशा 21 जून 2036 तक प्रभावशाली रहेगी।
सूर्यदशा में 30 मई 2026 केतु का प्रत्यंतर दशा प्रभावी होगी तो समूचे विश्व के लिए अत्यंत प्रतिकूल समय होगा। उपर्युक्त ज्योतिषीय विश्लेषण के आधार यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अभी जून माह तक तो इस युद्ध के बादल छंटते दिखाई नहीं दे रहे हैं।
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र