न तुम जीते न हम हारे...

Andrew Strauss : man of the match
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क्रिकेट के जिस एकदिवसीय मैच में 676 रन बल्ले से निकले हों और कुल 18 विकेट धराशायी हुए हो, उस मैच को आप क्या कहेंगे? रोमांच से भरपूर...और जिसका सनसनीखेज अंत 'टाई' पर समाप्त हुआ हो वह तो आँखों में लंबे समय तक बसा रहेगा। ये हाल रहा में और के बीच बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में खेले गए मैच का, जिसने दिल की धड़कनों को आखिरी लम्हों में कई गुना बढ़ा दिया था।

स्टेडियम के भीतर 45 हजार दर्शक जमा थे और इतनी ही तादाद में स्टेडियम के बाहर थे। यदि दिन में सचिन तेंडुलकर की आतिशी पारी (115 गेंदों पर 120 रन, 10 चौके, 5 छक्के) ने खूरंग जमाया तो 'दूधिया रोशनी' में इंग्लैंड के कप्तान एंड्रयू स्ट्रास की 'उजली बल्लेबाजी' ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर डाला। मैच में इतने उतार-चढ़ाव आए कि यह कहना पड़ेगा कि इस तरह के मैचों को उन्हें नहीं देखना चाहिए, जो दिल के साथ-साथ उच्च रक्तचाप के मरीज हैं।

भारत ने जब इस मैदान पर जीलिए 339 रनों का लक्ष्य इंग्लैंड के सामने रखा तो लगा कि यहाँ पर मेजबान टीम विश्वकप में अपनी लगातार दूसरी जीत दर्ज कर लेगी लेकिन अंग्रेज कप्तान एंड्रयू स्ट्रास के इरादे तो कुछ दूसरे ही थे। उन्होंने दिमागी संतुलन के साथ ही मानसिक दृढ़ता का परिचय देते हुए 158 रन (145 गेंद, 18 चौके, 1 छक्का) ठोंक डाले। एक समय स्ट्रास और इयान बेल (69) इंग्लैंड को जीत के दरवाजे पर ले जा रहे थे, तभी जहीर ने मैच को नाटकीय मोड़ पर ला खड़ा किया।

जहीर ने पहले बेल को विराट कोहली के हाथों में झिलवाया और अगली गेंद पर स्ट्रास को पगबाधा आउट किया। अगले ओवर (44.3) में जहीर ने कॉलिंगवुड के डंडे बिखेरकर भारत को मैच में वापस ला खड़ा किया। यहीं से मैच का असली रोमांच शुरु हुआ।

मैच के अंतिम 2 ओवर सनसनीखेज रहे। 48वें ओवर में ग्रीम स्वान ने पीयूष चावला की गेंद पर 77 मीटर लंबा छक्का लगाया और इसी ओवर में ब्रेसनन भी छक्का उड़ाने में सफल रहे। एक ओवर में 2 छक्के लगने से पलड़ा एक बार फिर इंग्लैंड की ओर झुक गया।

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जहाँ 9 गेंदों में इंग्लैड को 22 रन चाहिए थे, वही बाद में 8 पर 20, 7 पर 14, 6 गेंद पर 14 रन की दरकार हो गई। मैच के आखिरी ओवर की जिम्मेदारी मुनाफ पटेल की थी। जब इंग्लैंड को 4 गेंदों में 11 रन चाहिए थे, तब अजमल शहजाद ने छक्का लगाकर मैच की तस्वीर ही बदल दी। इंग्लैंड और जीत का फासला 3 गेंद में 5 रन का रह गया था और अंतिम गेंद पर जीत के लिए उसे 2 रन चाहिए थे लेकिन रन बना 1 और इस तरह इंग्लैंड 8 विकेट खोकर 338 रन बनाकर मैच पर खत्म करवाने में सफल रहा।

दोनों देशों की जीत में मैच में लगे 'छक्के' खलनायक साबित हुए। जहाँ भारत की पारी में सचिन के पाँच छक्कों ने 45 हजार दर्शकों को आंदोलित किया तो वहीं दूसरी तरफ इंग्लैंड की तरफ से मैच के आखिरी लम्हों में ब्रेसनन, स्वान और शहजाद के एक-एक छक्के ने भारत की थाली में परोसी हुई जीत छीन ली।

इंग्लैंड की गेंदबाजी के वक्त विकेट का‍ चरित्र कुछ दूसरा था और 50 ओवरों के बाद तो वह गेंदबाजों से पूरी तरह रूठ गया था। इंग्लैड के कप्तान स्ट्रास और बेल विकेट पर अंगद के पैर की मानिंद जम गए थे और दोनों तीसरे विकेट के लिए 181 रनों की साझेदारी कर चुके थे।

ये जोड़ी जब टूटी तो स्कोर 42.4 ओवर में 281 रन पर पहुँच चुका था। यहाँ बेल को जहीर ने पैवेलियन भेजकर आस जगाई थी। इस आस को और पंख तब लगे, जब स्ट्रास भी जहीर की गेंद पर विकेट के बीच पकड़े गए।

281 पर इंग्लैंड 4 विकेट गँवा चुका था और 47.3 ओवर में इंग्लैंड 307 रनों पर 7 विकेट गँवाकर किसी तरह हार को टालने के लिए संघर्ष कर रहा था। क्रिकेट की थोड़ी सी समझ रखने वाला भी इस स्कोर पर भारत के माथे पर ' जीत का तिलक' ही लगाना पसंद करेगा क्योंकि तब भी इंग्लैंड को जीत के लिए 32 रनों की जरूरत थी और 18 गेंद फेंकी जाना शेष थी।

जहीर खान 10 ओवरों का कोटा पूरा करके 64 रन देकर 3 विकेट लेतहुए अपना किरदार निभा चुके थे। धोनी के पास गेंदबाजी विकल्प के रूप में पीयूष चावला और मुनाफ पटेल थे, जिन्होंने अपनी गेंदों पर छक्के लुटाकर भारत को जीत का जश्न मनाने और 'स्वीट संडे' मनाने से वंचित कर दिया। इस मैच में एक बात तो साफ हुई कि निर्णायक मौके पर भारतीय गेंदबाजी का दम निकल गया।

टीइंडियबल्लेबाजों में सचिन तेंडुलकर, गौतम गंभीर के अलावा युवराज सिंह ने दर्शकों के साथ इंसाफ किया। सचिन ने अपने वनडे करियर का 47वाँ सैकड़ा पूरी आन, बान और शान के साथ पूरा किया। उनके टेस्ट शतकों (51 सैकड़े) को इस आँकड़े को शामिल कर लिया जाए तो वे शतकों के शतक से केवल 2 कदम दूर हैं।

सीमान्सुवी
कुल मिलाकर मैच में 'न तुम जीते, न हम हारे' वाली कहावत सिद्ध हो गई। बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में क्रिकेट के रोमांच की जीत हुई। इस 'टाई मैच' ने महेन्द्रसिंह धोनी को बहुत कुछ सीखने पर मजबूर किया होगा।



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