सिंहासन बत्तीसी : उन्‍नीसवीं पुतली रूपरेखा की कहानी

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उन्होंने उससे पूछा कि उसकी यह दशा कैसे हुई? जबकि मरते समय गोपालदास ने अपना सारा धन और व्यापार अपने दोनों पुत्रों में समान रुप से बांट दिया था। एक के हिस्से का धन इतना था कि दो पुश्तों तक आराम से ज़िन्दगी गुज़ारी जा सकती थी। विक्रम ने फिर उसके भाई के बारे में भी जानने की जिज्ञासा प्रकट की।

युवक समझ गया कि पूछने वाला सचमुच उसके परिवार के बारे में सारी जानकारी रखता है।

उसने विक्रम को अपने और अपने भाई के बारे में सब कुछ बता दिया। उसने बताया कि जब उसके पिता ने उसके और उसके भाई के बीच सब कुछ बांट दिया तो उसके भाई ने अपने हिस्से के धन का उपयोग बड़े ही समझदारी से किया।

उसने अपनी जरुरतों को सीमित रखकर सारा धन व्यापार में लगा दिया और दिन-रात मेहनत करके अपने व्यापार को कई गुणा बढ़ा लिया। अपने बुद्धिमान और संयमी भाई से उसने कोई प्रेरणा नहीं ली और अपने हिस्से में मिले अपार धन को देखकर घमंड से चूर हो गए।
शराबखोरी, वेश्‍यावृत्ति, जुआ खेलना समेत सारी बुरी आदतें डाल लीं। ये सारी आदतें उसके धन के भण्डार को तेजी से खोखला करने लगीं।




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