यूपी चुनाव : घोर उपेक्षा का शिकार हैं महिलाएं

लखनऊ| भाषा|
इसे विडम्बना कहा जाए या जनता का मजाक लेकिन इतिहास गवाह है कि सियासी नजरिए से देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्य में अब तक हुए विधानसभा चुनावों में प्रतिनिधित्व के मामले में महिलाएं घोर उपेक्षा का शिकार रही हैं।

उत्तर प्रदेश में वर्ष 1952 से लेकर अब तक कुल 15 बार विधानसभा के चुनाव हुए और निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के आधार पर विश्लेषण किया जाए तो अब तक इन विधानसभाओं में महिलाओं का औसत प्रतिनिधित्व मात्र 4.40 प्रतिशत ही रहा।

राजनीतिक पार्टियों की बात करें तो खुद को लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की पुरजोर वकालत करने वाली कांग्रेस ने राज्य में वर्ष 1952 से लेकर अब तक हुए विधानसभा चुनावों में सबसे ज्यादा कुल 338 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है जो कुल प्रत्याशियों का 17 प्रतिशत है।
औसत निकालें तो कांग्रेस ने हर चुनाव में 24 महिलाओं को प्रत्याशी बनाया है लेकिन महिला आरक्षण की कठोर पक्षधर कही जाने वाली पार्टी द्वारा पेश किया गया यह आंकड़ा ‘आधी आबादी’ के साथ कतई इंसाफ नहीं करता।

महिलाओं ने सामाजिक वर्जनाओं के बावजूद अपने मौलिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए राजनीति में भागीदारी की कोशिश की है।
इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि अब तक हुए विधानसभा के कुल 15 चुनावों में खड़ी हुई 1985 महिला उम्मीदवारों में से 826 यानी 41.61 प्रतिशत औरतों ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा है लेकिन उनमें से सिर्फ तीन ही चुनाव जीत सकीं।

चुनाव आयोग के दस्तावेजों के मुताबिक वर्ष 1977 में हुए विधानसभा चुनाव में संडीला से कुदसिया बेगम के रूप में पहली बार निर्दलीय प्रत्याशी ने जीत दर्ज की थी। उसके बाद वर्ष 1989 के चुनाव में गौरी बाजार क्षेत्र से लालझड़ी नामक निर्दलीय महिला चुनाव जीती थीं। बाद में 1996 में बलिया सीट से निर्दलीय प्रत्याशी मंजू ने विजय हासिल की लेकिन उसके बाद से यह सिलसिला आगे नहीं बढ़ सका।
प्रदेश के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो समाजवाद का झंडा बुलंद करने वाली पार्टियों- सोशलिस्ट पार्टी, किसान मजदूर प्रजा पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, जनता दल, भारतीय क्रांति दल और समाजवादी पार्टी ने अब तक कुल 122 महिलाओं को उम्मीदवार बनाया।

राष्ट्रवाद का नारा बुलंद करने वाले जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश के संसदीय इतिहास में कुल 131 महिलाओं को प्रत्याशी बनाया है। वहीं, वर्ष 1989 में पहली बार चुनाव लड़ने वाली बसपा ने अब तक सिर्फ 52 महिलाओं को ही उम्मीदवार बनाया है।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कुल 347 सीटों पर खड़े हुए 2604 प्रत्याशियों में से सिर्फ 25 महिला उम्मीदवार मैदान में थीं जिनमें से सिर्फ चार को ही जीत मिली। इस तरह उस विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 0. 86 प्रतिशत रहा।

चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 1957 में कुल 341 सीटों पर खड़े 1759 प्रत्याशियों में से महिला उम्मीदवारों की संख्या 39 रही जिनमें से कुल 18 निर्वाचित हुईं और विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 5. 27 प्रतिशत रहा।
साल 1962 में हुए विधानसभा चुनाव में कुल 430 सीटों पर खड़े 2620 में से 61 महिला प्रत्याशी थीं। उनमें से कुल 20 महिलायें निर्वाचित हुईं। इस तरह उस विधानसभा में महिलाओं की नुमाइंदगी सिर्फ 4.65 फीसद रही।


साल 1967 के चुनाव में कुल 425 सीटों पर खड़े हुए 3014 में से महिला उम्मीदवारों की संख्या 39 थी जिनमें से सिर्फ छह ही निर्वाचित हुईं। इन निराशाजनक परिणामों से विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 1.41 प्रतिशत रहा।
वर्ष 1969 में हुए मध्यावधि चुनाव में कुल 425 सीटों पर कुल 1791 उम्मीदवारों ने किस्मत आजमाई जिनमें से 55 महिलाएं थी। इस चुनाव में कुल 18 औरतें निर्वाचित हुईं। इस तरह उस विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व 4.23 प्रतिशत रहा।

साल 1974 के विधानसभा चुनाव में कुल 424 सीटों पर खड़े 4039 उम्मीदवारों में से 92 महिलाएं थीं। उनमें से कुल 21 निर्वाचित हुई। नतीजतन विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 4. 95 प्रतिशत रहा।
वर्ष 1977 के चुनाव में विधानसभा की कुल 425 सीटों पर खड़े 3012 उम्मीदवारों में से 63 महिलाओं ने किस्मत आजमाई लेकिन उनमें से सिर्फ 11 ही सफल रहीं और विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 2. 58 प्रतिशत रहा।

साल 1980 में हुए मध्यावधि चुनाव में कुल 425 सीटों पर 85 महिला उम्मीदवार खड़ी हुईं जिनमें से 23 निर्वाचित हुईं। इस तरह विधानसभा में औरतों का प्रतिनिधित्व 5. 41 प्रतिशत रहा। भाजपा पहली बार चुनाव लड़ी। उसने पांच महिलाओं को टिकट दिया लेकिन उनमें से कोई जीत हासिल नहीं कर सकी।
वर्ष 1985 में हुए विधानसभा चुनाव में कुल 425 सीटों पर 168 महिलाओं ने दावेदारी ठोंकी जिनमें से 31 निर्वाचित हुईं। इस तरह विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व 7.29 प्रतिशत रहा। कांग्रेस ने 37 सीटों पर महिला उम्मीदवारों को उतारा जिनमें से 26 निर्वाचित हुईं।

साल 1989 में हुए चुनाव में कुल 425 सीटों पर 6102 प्रत्याशियों में से 201 महिलाएं चुनाव मैदान में उतरीं जिनमें से सिर्फ 18 ही जीत हासिल कर सकीं और विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 4.23 प्रतिशत रहा।
वर्ष 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में कुल 422 सीटों पर 9726 प्रत्याशियों में से 253 महिलाओं ने चुनाव लड़ा लेकिन उनमें से महज 14 की ही चुनावी नैया पार लग सकी। इस तरह विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 3.31 प्रतिशत रहा।

वर्ष 1996 में हुए मध्यावधि चुनाव में कुल 424 सीटों पर 1029 उम्मीदवारों में से 190 महिलाएं रहीं जिनमें से 20 ने जीत हासिल की। उस बार विधानसभा में ‘आधी आबादी’ का प्रतिनिधित्व 4.71 प्रतिशत रहा।
उत्तराखंड के अलग होने के बाद साल 2002 में राज्य में पहली बार हुए विधानसभा चुनाव में कुल 403 सीटों पर 5533 उम्मीदवारों में से 344 महिलाओं ने चुनावी रण में हिस्सा लिया। उनमें से सिर्फ 26 ही जीत सकीं। इस तरह विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 6.45 प्रतिशत रहा।

साल 2002 में हुए चुनाव में कांग्रेस ने 30 महिलाओं को टिकट दिए, जिनमें कायमगंज से लुइस खुर्शीद जीतीं। बाकी 29 की जमानत जब्त हो गई।
वर्ष 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में कुल 403 सीटों पर 6086 उम्मीदवारों में से कुल 370 महिलाओं ने भागीदारी की। उनमें से महज 23 ने जीत हासिल की। इस तरह विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 5.70 प्रतिशत ही रहा।

इस तरह ‘आधी आबादी’ कही जाने वाली महिलाओं का विधानसभा में प्रतिनिधित्व कभी आठ प्रतिशत के आंकड़े तक को नहीं छू सका जो महिला आरक्षण विधेयक पर तीखी बहस के दौर में सियासत में महिलाओं की नुमाइंदगी की जमीनी हकीकत बताने के लिए काफी है। (भाषा)



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