डार्विन का पत्र एमा के नाम

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(डार्विन : जिसके विकासवाद के सिद्धांत ने दुनिया भर के सोचने-समझने को आमूलचूल परिवर्तित कर दिया... उन्नीसवीं शताब्दी का वह महान क्रांतिकारी वैज्ञानिक...)

- मूर पार्क, बुधवार अप्रैल, 1858

प्रिये,

मौसम बहुत मजेदार है। कल तुम्हें पत्र लिखने के बाद मैं मैदान के कुछ आगे तक डेढ़ घंटे घूमता और आनंद लेता रहा। स्कॉटलैंड के देवदार के पेड़ों की ताजी, फिर भी गहरी हरियाली, सफेद तनों वाले पुराने 'विर्च' के पेड़ों के भूरे-भूरे फूल, बबूल के पेड़ों पर लटकी हरी-हरी झालरें बहुत ही प्यारा दृश्य उपस्थित कर रही थीं। अंत में मैं घास पर गहरी नींद में सो गया और तब जागा जब मेरे चारों ओर चिड़ियाँ कोरस गा रही थीं, गिलहरियाँ भाग-भागकर पेड़ों पर चढ़ रही थीं और कुछ कठफोड़वे हँस रहे थे। यह ऐसा मनोरंजक और ग्रामीण दृश्य था कि मैं... एकदम भूल गया कि पशु और पक्षी किस प्रकार बनाए गए थे...।
-डार्विन



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