वली दाद के तोहफे

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एक छोटी सी झोपड़ी में बूढ़ा घसियारा रहता था। नाम था वली दाद। उसकी दिनचर्या तय थी कि सुबह वह घास काटता, उसका पूला बनाता और दोपहर में जाकर बाजार में बेच आता। रोजाना घास बेचने पर उसे तीस पैसे मिलते थे। दस पैसे खाने पर खर्च होते थे, दस पैसे कपड़े और दूसरी चीजों पर और दस पैसे रोज की बचत थी। बचत को वली दाद अपनी खटिया के नीचे एक बोरे में डाल देता था। सालों-साल से वली दाद इसी तरह राजी-खुशी अपना जीवन बिता रहा था।

एक रात सोने से पहले वली दाद ने सोचा कि क्यों न देखा जाए कि बोरे में कितने पैसे इकट्ठा हो गए हैं। यह सोचकर उसने बोरा खोला तो उसकी नींद उड़ गई। बोरे में इतने पैसे थे कि वली दाद को चार बार तोला जा सकता था। सिक्के इतने थे कि आज से वली दाद को अगले कुछ सालों तक कमाने की कोई जरूरत नहीं थी। इतने सारे रुपए? इन रुपयों का मैं क्या करूँ? वली दाद उलझन में पड़ गया। वली दाद ने मन ही मन कहा कि मुझे तो किसी भी चीज की जरूरत नहीं है। फिर इन पैसों का क्या उपयोग किया जाए। बहुत सोचने के बाद वली दाद को कुछ सूझा और तब जाकर उसे नींद आई।

अगले दिन वली दाद ने सिक्कों से भरे बोरे को कंधे पर लादा और बाजार चला। वह एक सुनार के यहाँ गया। सुनार ने वली दाद को देखकर आश्चर्य किया। कारण यह था कि उसने आज तक सुनार से कुछ नहीं खरीदा था, फिर उसकी हैसियत का भी सुनार को अंदाजा था। वली दाद ने अपने सारे सिक्के सुनार को दे दिए और उसके बदले में कहा कि कोई खूबसूरत-सी चीज मुझे दे दो। सुनार को वली दाद की ईमानदारी पर विश्वास था इसलिए बिना पूछताछ उसने सिक्कों के बदले सोने का सुंदर कंगन वली दाद को दे दिया। घर आकर वली दाद ने अपने एक व्यापारी दोस्त से सलाह माँगी कि इस कंगन को क्या मैं राजकुमारीजी को भेंट कर सकता हूँ।
व्यापारी ने कहा कि तुम ठीक सोच रहे हो। कंगन राजकुमारी के सुंदर हाथों में ही अच्छा लगेगा। वली दाद ने व्यापारी से कहा कि मित्र तुम्हें मेरी मदद करना होगी। कल तुम राजमहल जाना होगा और और मेरी शुभकामना के साथ यह कंगन राजकुमारी को भेंट कर देना। व्यापारी को खुशी हुई कि वली दाद ने उस पर इतना विश्वास किया और वह राजी हो गया।

अगले दिन व्यापारी राजमहल गया और उसने राजकुमारी को कंगन भेंट किया। कंगन वाकई बहुत खूबसूरत था। राजकुमारी उसे देखती ही रह गई। उन्होंने कहा कि तुम्हारे दोस्त का यह तोहफा हमें बेहद पसंद आया। तुम्हारा दोस्त एक अच्छा इंसान मालूम होता है। तुम्हारे उस भले दोस्त को हमारा भी एक तोहफा कबूल करना होगा। व्यापारी राजकुमारी को मना तो कर नहीं सकता था। महारानी ने एक ऊँट पर बहुत सारा सिल्क का कपड़ा वली दाद के लिए भेजा।
व्यापारी वापस लौटा और उसने सिल्क से लदा ऊँट वली दाद की झोपड़ी के बाहर ले जाकर खड़ा कर दिया। व्यापारी ने सारा किस्सा वली दाद को कह सुनाया। सुनकर वली दाद ने सिर पीट लिया। उसने कहा कि अब वह इस सिल्क का क्या करे। उसे तो इसकी जरूरत ही नहीं है। वली दाद ने तुरंत व्यापारी से पूछा - बताओ इस दुनिया में सबसे भला पुरुष कौन है?

व्यापारी ने उत्तर दिया - पड़ोसी देश का राजकुमार। सुना है बड़ा ही भला इंसान है वह। हर जरूरतमंद की मदद करता है। वली दाद ने अगले ही पल कहा कि फिर मेरी एक मदद और करो। यह सिल्क का तोहफा शुभकामना के साथ तुम पड़ोसी राजकुमार तक पहुँचा दो।
व्यापारी को यह बात कुछ समझ नहीं आई पर उसने हामी भर ली। अगले दिन वह तोहफा लेकर पड़ोसी राजकुमार के सामने पहुँचा राजकुमार को तोहफा अच्छा लगा। उसने व्यापारी से कहा कि तुम्हारा दोस्त अच्छा इंसान मालूम होता है और इ‍सलिए मैं भी उसके लिए एक तोहफा भिजवाना चाहता हूँ।

राजकुमार ने अपने अस्तबल से एक दर्जन बेहतरीन घोड़े व्यापारी के साथ कर दिए। व्यापारी ने एक दर्जन घोड़े लाकर वली दाद के दरवाजे पर खड़े कर दिए। वली दाद चीजों से चाहकर भी नहीं छूट पा रहा था। वह दुखी होकर व्यापारी से बोला - अब इन दर्जनभर घोड़ों का मैं क्या करूँ? तभी वली दाद ने कुछ सोचकर कहा मित्र, तुमने मेरी बहुत मदद की है तो दो घोड़े तुम रख लो बाकी के दस घोड़े राजकुमारी को भेंट पहुँचा दो, ताकि मुझे झंझट से छुट्‍टी मिले। व्यापारी को अब इस काम में मजा आने लगा था वह खुशी-खुशी राजी हो गया।
व्यापारी अगले दिन गया और राजकुमारी को दस घोड़े भेंट किए। महारानी तोहफे के बदले तोहफा पाकर चौंक गई। उन्होंने अपने प्रधानमंत्री से पूछा - मैंने तो कभी वली दाद का नाम भी नहीं सुना फिर यह वली दाद तोहफे क्यों भेज रहा है? प्रधानमंत्री ने कहा - राजकुमारी जी, किसी के भेजे गए तोहफों का अपमान नहीं करना चाहिए और किसी भी व्यक्ति को उसके नाम से नहीं उसके काम से पहचानना चाहिए।
वली दाद भला इंसान लगता है और आपके तोहफे के बदले अपनी तरफ से भी तोहफा भेजना चाहिए। राजकुमारी ने घोड़े रख लिए और उसके बदले में 20 खच्चरों पर मोती लादकर वली दाद के लिए उपहार स्वरूप भेज दिए।

जब खच्चर वली दाद की झोपड़ी के बाहर पहुँचे तो वली दाद उन्हें देखते से ही दुखी हो गया। उसने दुखी होकर कहा - पता नहीं ये तोहफे क्यों मेरे पीछे पड़ गए हैं। वली दाद ने अपने व्यापारी मित्र से कहा कि तुम एक काम करो इसमें से दो खच्चर मोती अपने पास रख लो और बाकी पड़ोसी राजकुमार को मेरी तरफ से भेंट कर आओ।
व्यापारी ने ऐसा ही किया। पड़ोसी राजकुमार ने जब अठारह खच्चरों पर लदे मोती देखे तो वह हैरान रह गया। उसे लगा कि वली दाद उसकी हैसियत की परीक्षा ले रहा है। तो बदले में राजकुमार ने सोने की पायल पहने बीस ऊँट, सोने की लगाम और चाबुक से सजे बीस घोड़े, सोने के डोले से सजे बीस हाथी और बीस नौकर-चाकर वली दाद के लिए बतौर तोहफा भेज दिए।

व्यापारी मित्र इस बड़े तोहफे के साथ वली दाद के यहाँ पहुँचा। वली दाद अब तो परेशान हो गया। उसने व्यापारी मित्र से कहा कि तुम्हें इसमें से जितना रखना है रख लो बाकी का राजकुमारी जी के लिए उपहार भेज दो। व्यापारी मित्र बोला कि मेरा बार-बार राजकुमारी के पास जाना ठीक नहीं लगता, पर वली दाद ने उसे एक और बार के लिए राजी कर लिया।
इस बार जैसे ही व्यापारी राजकुमारी के दरबार पहुँचा तो राजकुमारी को जैसे उसका ही डर था। राजकुमारी ने जैसे ही वली दाद का तोहफा देखा तो उसका सिर चकरा गया। उनके प्रधानमंत्री ने कहा कि मुझे लगता है वली दाद आपसे विवाह करना चाहता है तभी तो वह आपके लिए इतने सुंदर तोहफे भेज रहा है। आपको उससे मिलना चाहिए।

राजकुमारी लाव-लश्कर के साथ वली दाद से मिलने निकल पड़ी। रास्ते में महारानी ने पड़ाव डाला और व्यापारी से कहा कि जाकर अपने दोस्त को सूचित कर दो कि राजकुमारी मिलने आ रही है। जब वली दाद ने यह सुना तो माथा पकड़ लिया। अब क्या करें? व्यापारी ने कहा कि अब तो कारवाँ वापस भी नहीं लौट सकता है। यह सूचना देकर व्यापारी थोड़ी दूर गया तो दूसरी तरफ से पड़ोसी राजकुमार अपने सैनिकों के साथ आता दिखा।
राजकुमारी और राजकुमार दोनों वली दाद की झोपड़ी के बाहर खड़े थे। वली दाद ने दोनों की मुलाकात करवाई। राजकुमार और राजकुमारी दोनों ने एक-दूसरे को विवाह के लिए पसंद कर लिया। वली दाद से मिलकर दोनों बहुत प्रसन्न हुए। दोनों वली दाद को बहुत सारे तोहफे देना चाहते थे पर वली दाद ने कहा कि वह घास काटकर गुजारा करने वाली अपनी जिंदगी से खुश है। राजकुमारी बोलीं - तुम सच्चे और नेकदिल इंसान हो वली, जिसके मन में कोई लालच नहीं है। कल से तुम खुशी से अपना काम करो। राजकुमार और राजकुमारी के जाने के बाद वली दाद रात को चैन की नींद सोया। नींद भी अच्‍छी आई, क्योंकि उसके सिर से बहुत बड़ा बोझ उतर चुका था।
(यह लोककथा भारत और पाकिस्तान में प्रचलित है।)



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