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Vyangya News paper photo | अखबार में छपी उनकी तस्वीर

अखबार तस्वीर व्यंग्य
सत सोनी

सुबह-सुबह फोन बज उठा : "मैं मुकुंदीलाल बोल रहा हूँ, तुमसे एक जरूरी काम है क्या अभी आ सकते हो?"
आधे घंटे में मैं उनके यहाँ जा पहुँचा। वह अखबारों से घिरे बैठे थे। मन का भारीपन साफ दिख रहा था : "तुमने आज का "वीर भारत" देखा है?" मैंने बताया : "एक भी अखबार नहीं देखा। अभी-अभी सोकर उठा था। बस, सीधे चला आ रहा हूँ।" उन्होंने वीर भारत सेंटर से खोलकर मेज पर फैला दिया : "यह देखो।" दाईं ओर फुल पेज का विज्ञापन था जिसमें उनकी बड़ी सी तस्वीर भी थी। कहने लगे : "मैं इस अखबार पर मुकदमा करने की सोच रहा हूँ।"

मुकुंदीलाल नेता नहीं थे। विधानसभा, नगरपालिका तो क्या, उन्होंने कभी किसी संस्था-संगठन का भी चुनाव नहीं लड़ा था लेकिन प्रदेश की राजनीति में उन्हीं का सिक्का चलता था। चुनाव आने पर तो कई नेता उनके आगे-पीछे घूमते थे। सरकार कभी लड़खड़ाने लगती तो मुकुंदीलाल का भाव बढ़ जाता। दरअसल, घोड़े-गधे दौड़ाने में उन्हें महारत हासिल थी। विधायकों को इस पार्टी से उस पार्टी में ले जाना उनकी एक बड़ी खासियत थी। उम्र में वह मुझसे १५-२० साल बड़े थे।

हमारी दोस्ती तो नहीं थी लेकिन जाने क्यों वह मुझ पर बहुत भरोसा करते थे। एक बार मैंने उनसे पूछा था कि आप चुनाव लड़कर मंत्री, मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन जाते? उनका जवाब था : "गद्दी पर बैठनेवाले से ज्यादा पावरफुल गद्दी पर बैठानेवाला होता है।" हाँ, तो मैं कह रहा था कि मुकुंदीलाल जी ने "वीर भारत" अखबार मेज पर फैला दिया। सेंटर में दाईं तरफ फुल पेज के विज्ञापन में उनकी बड़ी-सी तस्वीर थी। बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था : "अखिल प्रदेश व्यापार महासंघ के नए संरक्षक श्री मुकुंदीलाल जी को बधाई" इसके नीचे वही सब कुछ जो प्रायः ऐसे विज्ञापनों में होता है : "प्रदेश का समूचा व्यापारी वर्ग श्री मुकुंदीलाल जी को अपने महासंघ का संरक्षक बनाकर गौरवान्वित महसूस करता है।
हमें विश्वास है कि उनके मार्गदर्शन में हमारी संस्था दिन दुगनी..." वगैरह-वगैरह। नीचे करीब दो दर्जन पदाधिकारियों के नाम थे।

मुकुंदीलाल बोले "हो न हो, यह विज्ञापन जगतराम ने दिलवाया है जो आनेवाले चुनावों में अपनी पार्टी के टिकट का इच्छुक है।"

मैंने कहा : "लेकिन उसमें तो ऐसी कोई बात नहीं है जिसकी वजह से अखबार पर मुकदमा किया जा सके।" उन्होंने मुझे यों देखा जैसे कोई मास्टरजी अपने नालायक छात्र को देख रहे हों : बोले "दूसरी तरफ देखो।"

बाएँ पेज पर किसी कंपनी के नए जूतों का फुल पेज का इश्तेहार था। फिर भी मैं समझ नहीं पाया। अब मुकुंदीलाल जी ने उन दो पन्नों को बंद किया, फिर खोला। अब मेरा भेजा ठनका। अखबार बंद करने पर सामनेवाले पेज पर छपा एक जूता मुकुंदीलाल के चेहरे पर पड़ता था। कहने लगे : "तुम अपने एडिटर से बात करके कल के अखबार के पहले पेज पर मेरा बयान छाप दो कि इस बेइज्जती के लिए मुकुंदीलाल "वीर भारत" पर मुकदमा करने जा रहे हैं।"

मैंने कहा : "ऐसा हरगिज मत कीजिएगा। आपकी फोटो और जूते के बीच का नाता जब मैं ही नहीं जान पाया तो आम लोग इतनी गहराई में कैसे पहुँच पाएँगे? आपका बयान छपते ही लोग आज के इस अखबार को उसी तरह देखेंगे जिस तरह आपने बार-बार बंद करके मुझे दिखाया है।

लोग हँसेंगे और आपके दुश्मनों को मजाक उड़ाने का अच्छा-खासा मौका और मसाला मिल जाएगा। वैसे भी, विज्ञापनों से संपादक का कोई सरोकार नहीं होता। यह काम अखबार के विज्ञापन विभाग का है। कौन-सा विज्ञापन कहाँ लगाया गया है, एडिटर को इसकी खबर नहीं होती। दस-बारह साल बाद आप मुकदमा जीत भी गए तो अखबार को दो-चार हजार रुपए का जुर्माना होगा। तब तक आपका मान-सम्मान मिट्टी में मिल चुका होगा।"

मुकुंदीलाल कुछ सोच कर बोले : "ठीक कहते हो लेकिन यह बात तुम तक ही रहनी चाहिए।"