मनोहर श्याम जोशी - अधूरी किताबों की तरह जिंदगी भी अधूरी...

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हिन्दी के पाठक अब दो किताबों को शायद कभी नहीं पढ़ पाएँगे। इनमें से एक है अपिशजी और दूसरी कंबोडिया की पृष्ठभूमि पर लिखी गई किताब, क्योंकि इन्हें लिखने वाली कलम में जीवन की स्याही खत्म हो गई। लेखक मनोहर श्याम जोशी ने ही इन किताबों को अधूरा छोड़ दिया। कई विधाओं में हिन्दी साहित्य की रचना करने वाले इस व्यक्तित्व को पत्रकार कहा जाए, लेखक या फिल्मों का कहानीकार- कोई फर्क नहीं पड़ता। देश में सोप ओपरा लिखने वाले वे पहले लेखक हैं। टेलीविजन के दूरदर्शनी दौर में 'बुनियाद' और 'हम लोग' का जो क्रेज रहा है, उसे याद किया जाए तो आज के सास-बहू ब्रांड धारावाहिकों का कद काफी छोटा नजर आता है। 'बुनियाद' में बँटवारे की पीड़ा का दर्द और 'हम लोग' का सामाजिक सरोकार आज भी कचोटता-सा है।

यह कहना काफी मुश्किल है कि मनोहर श्याम जोशी किस विधा के महारथी थे, क्योंकि उनके व्यंग्यों में जितना तीखापन था उनके सामाजिक लेखन में उतनी ही संवेदना भी भरी थी। वे विज्ञान पर भी कलम चलाते रहते थे और राजनीति पर भी उतना ही खम ठोंककर लिखते थे। समाज में व्यंग्य की क्या अहमियत है, यह मनोहरजी से ज्यादा शायद कोई नहीं जान सकता। इसीलिए वे समाज में व्यंग्य की घटती जरूरत से भी चिंतित थे। एक बातचीत में उन्होंने कहा भी था कि 'समाज में व्यंग्य की जगह खत्म हो गई, क्योंकि आज सचाई ही व्यंग्य से बड़ी हो गई। कारण कि व्यंग्य उस समाज के लिए है, जहाँ सबकुछ दबा-छुपा रहता है और लोग छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर संवेदनशील रहते हैं। लेकिन दुख की बात यह कि हम ऐसे निर्लज्ज समाज में रहते हैं, जहाँ व्यंग्य से क्या फर्क पड़ता है।'

टेलीविजन के लिए धारावाहिक लिखने के मामले में उन्हें सिद्धहस्त माना जाता था, पर लंबे अरसे से उन्होंने इससे भी हाथ झाड़ लिए थे। उनका कहना था कि 'अब धारावाहिक लेखकों की इज्जत नहीं रह गई इसलिए मैंने भी इससे किनारा कर लिया। आज तो टीवी पर दिहाड़ी लेखकों की बाढ़ आ गई है। मैं इसमें अपना समय क्यों बर्बाद करूँ!' पर समय की इतनी कद्र करने वाले मनोहरजी को इतना समय भी नहीं मिल सका कि वे अपनी अधूरी किताबों को पूरा कर सकते। जो उन्हें जानते हैं उन्हें पता है कि उन्होंने जितना लिखा उससे ज्यादा अधूरा छोड़ दिया। लेकिन उनके स्वभाव में रचा-बसा संशय भाव और आलसीपन इतना प्रबल था कि वे अक्सर चीजों को अपूर्ण स्थिति में रखकर वीतरागी मुद्रा अपना लेते थे। 'कुरु-कुरु स्वाहा' और 'कसप' से पहले भी वे तीन अधूरे उपन्यास लिख चुके थे, पर उन्होंने कभी इन्हें पूरा करने की कोशिश नहीं की। अपने छात्र जीवन में ही उन्होंने एक साथ दो-दो उपन्यास लिखना शुरू कर दिए थे, पर कभी छपाए नहीं। उनके एक उपन्यास 'अंत और आदि' की पांडुलिपि तो वे अभी तक संभालकर रखे थे।
हिन्दी साहित्य में किस्सागोईनुमा लेखन के मामले में भी मनोहरजी का कोई सानी नहीं रहा। 1981 में जब उनका व्यंग्य उपन्यास 'कुरु-कुरु स्वाहा' छपकर आया तब पाठक उनकी खिलंदड़ भाषा, जबर्दस्त किस्सागोई और ट्रैजी-कॉमिक से चमत्कृत हो गए। वे मानते थे कि लेखन में किस्सागोई की कला उन्हें घुट्टी में मिली है। उनका ननिहाल कुमाऊँनी ब्राह्मणों के विशिष्ट परिवारों में जाना जाता था। किस्सागोई और अभिजात्यता इस परिवार के खून में समाई थी। मनोहरजी की माताजी को भी नकलें उतारने और लतीफे गढ़ने में महारथ हासिल थी। मनोहरजी के पिता के परिवार में भी पढ़ने-लिखने का माहौल था। लेकिन स्वयं मनोहर श्याम जोशी में लेखन का यह संस्कार जरा देर से आया।
उनके उपन्यासों में हास्य-व्यंग्य के साथ अवसाद की गहरी वेदना भी हमेशा महसूस की गई। इस बारे में वे कहा करते थे कि यह पीड़ा जवानी के दिनों में मिली असफलता से उपजी सचाई है और कुछ नहीं। अवसाद के कारणों में बचपन में अनाथ हो जाना, माँ को वह सारे सुख न दे पाना जो इच्छाएँ थीं और बड़े भाई की आत्महत्या को मैं अपने जीवन की असफलताओं की फेहरिस्त मानता हूँ।
मनोहर श्याम जोशी जितने अच्छे लेखक थे उतने ही अच्छे व्यक्ति भी। अपने दोनों ही रूपों में उन्होंने अपनी पहचान कायम रखी। उनकी पहली कहानी 18 साल की उम्र में छपी थी और पहला उपन्यास हाथ में आया तब वे 47 पूरे कर चुके थे। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि उनकी रचनाधर्मिता की गति क्या रही। इसे उनका आलसीपन कहा जा सकता है या लेखन की पूर्णता की सनक, कोई फर्क नहीं पड़ता।
मनोहर श्याम जोशी नौकरी की तलाश में भटकते-भटकते पत्रकारिता में आ गए और बाद में अपने आस-पास बिखरे व्यंग्य को समेटकर शब्दों में ढालकर पाठकों पर छा गए। इसी दौर में दूरदर्शन जो तब अपने शैशवकाल में था, उसे अपनी कलम का सहारा देकर खड़ा किया। बाद में फिर किताबों की दुनिया में रम गए और एक दिन इतने चुपके से चल दिए कि खबर भी उसी छोटे परदे ने ही दी जिसे वे तिलांजलि दे चुके थे।
कहाँ कहाँ से गुजर गए
मनोहर श्याम जोशी का जन्म 9 अगस्त 1933 को अजमेर में हुआ था। लखनऊ विश्वविद्यालय से उन्होंने विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई की कुछ दिनों स्कूल में शिक्षक रहे फिर उत्तरप्रदेश सरकार के एक दफ्तर में र्क्लक हो गए। पर दोनों ही नौकरियों में मन नहीं लगा तो पत्रकारिता करने का विचार किया और दिल्ली आ गए।

यहाँ अमृतलाल नागर और अज्ञेय के सानिध्य में रहकर पत्रकारिता में अपनी जगह बनाई। खेलकूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक पर लिखा। केंद्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑव इंडिया के बाद हिंदुस्तान टाइम्स से जुड़े और 'साप्ताहिक हिंदुस्तान' के संपादक बने। वहीं एक अँगरेजी साप्ताहिक का भी संपादन किया। टेलीविजन धारावाहिक 'हम लोग' लिखने के लिए संपादकी छोड़ दी और इसके बाद पूरी तरह लेखन में रम गए।



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