दिनकर की 'शरद' पर कविता
रामधारी सिंह दिनकर
औ शरत अभी क्या गम है तू ही वसंत से क्या कम है है बिछी दूर तक दूब हरी हरियाली ओढ़े लता खड़ी कासों के हिलते श्वेत फूल फूली छतरी ताने बबूल अब भी लजवंती झीनी है मंजरी बेर रस भीनी है कोयल न (रात वह भी कूकी, तुझ पर रीझी, बंसी फूंकी) कोयल न कीर तो बोले हैं कुररी मैना रस घोले हैं कवियों की उपम की आंखें खंजन फड़काती है पांखें रजनी बरसाती ओस ढेरदेती भू पर मोती बिखेर नभ नील स्वच्छ सुंदर तड़ाग न शरत् न, शुचिता का सुहाग औ। शरत् गंग लेखनी, आह! शुचिता का यह निर्मल प्रवाह पल भर निमग्न इसमें हो लेवरदान मांग, किल्वष धो ले।