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Hindi Poem on Love | खुले आकाश की ठंडी हवा

फाल्गुनी

प्यार पर कविता
इस विषैले धूएं से सराबोर
अजनबी दुनिया में तुम
खुले आकाश की ठंडी हवा हो
मैं जानती हूं,
मगर फिर भी न जाने क्यों
आजकल मुझे तुमसे डर लगता है।

मैं जानती हूं कि
तुम विश्वास का श्वेत उजियारा हो
मगर इन दिनों अविश्वास के
भयावह झंझावात में खड़ी अकेली
मुझे तुमसे डर लगता है।

दर्द की ना जाने कितनी लहरें
मेरे मन के महासिंधु में
उमड़-घुमड़ कर ठहर जाती है
मैं रोज इनमें से बटोर लाती हूं
आशा के दमकते मोती,
मेरे दोस्त, मैं जानती हूं
ये मोती तुम हो
मगर फिर भी समाज के
तड़ातड़ पड़ते
थपेड़ों को सहती
आजकल मुझे तुमसे डर लगता है।