कृष्णकांत दुबे : आवाज की दुनिया के सितारे

अनंत आकाश में विलिन हो गई नंदाजी की वाणी

कृष्णकांत दुबे
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जीवन के साथ उम्र की हद तयशुदा है। नंदाजी के नाम से मशहूर पूरे मालवी-निमाड़ी जनपद के लाड़ले कृष्णकांत दुबे भी उससे अछूते नहीं रहे और उस अनंत आकाश में विलीन हो गए जहाँ से अब उनकी वाणी को सुना नहीं जा सकेगा। जमाना बड़ा बेरहम है साहब और उसकी याददाश्त और ज्यादा खराब। अभी बीस बरस पहले की ही तो बात है जब मालवा-हाउस का रूतबा पूरे मालवा-निमाड़ मे छाया हुआ था और उसी के ईमानदार और निष्ठावान लोगों की संक्षिप्त सी सूची में कृष्णकांत दुबे आखिरी नाम थे।

यानी उनके बाद अब वैसे लोगों का नामोनिशान ही मिट गया समझिए। नंदाजी और दुबेजी आपस में ऐसे गडमड हो गए थे जैसे उस्ताद बिसमिल्ला ख़ान की शहनाई और पंडित रविशंकर का सितार। एक प्रतिष्ठित प्रसारण संस्था के लेखक और प्रसारणकर्ता के रूप में कृष्णकांत दुबे (नंदाजी) अपने आप में एक करिश्मा ही थे।

दुबेजी सन्‌ 1948 से 1954 तक नईदुनिया के संपादकीय सहयोगी रहे। शब्द से दुबेजी का साथ जीवनपर्यंत बना रहा। आकाशवाणी की वाचिक परंपरा के प्रमुख हस्ताक्षरों के रूप में कभी भी भुलाए नहीं जा सकेंगे। जो काम उन्होंने इंदौर में रह कर किया वह यदि दिल्ली-मुंबई में किया होता तो शायद उनका नाम भी प्रभाकर माचवे, चिरंजीत, सुरेश अवस्थी, जसदेवसिंह या पं.नरेन्द्र शर्मा से कम नहीं होता। लेकिन न जाने क्यों मालवी आदमी अपनी मिट्टी में एक किस्म का 'कम्फर्ट झोन' तलाश लेता है। उसी के आसरे अपनी जिन्दगी के सारे सुखों और उपलब्धियों को परिभाषित कर लेता है।

दुबेजी भी मालवा हाउस के संतोषी और सुखी जीव बने रहे। सरलता और सौजन्यता का भाव ऐसा कि जब जिसने जो कहा, कर दिया। दुबेजी आकाशवाणी इंदौर के ऐसे पाने थे जो किसी भी बोल्ट पर फिट हो जाता था। निर्विवाद रूप से वे खेती-गृहस्थी या ग्राम सभा कार्यक्रम का ऑक्सीजन थे और अपने अन्य दो साथियों भेराजी और कान्हाजी के साथ बरसों-बरस तक इस कार्यक्रम को निर्बाध चलाते रहे। ना कोई स्क्रिप्ट और ना कोई पूर्व-योजना। बस मौसम के मिजाज से ये जान लेते थे कि हमारे मालवा-निमा़ड़ के किसान भाइयों के खेत-खलिहानों में क्या हो रहा होगा और हाल-फिलहाल क्या कुछ बोलने की जरूरत है।

आपको जानकर हैरत होगी कि किसान भाइयों के नब्बे फीसदी कार्यक्रमों का प्रसारण लाइव हुआ है। हाँ, उसमें प्रसारित होने वाली भेंटवार्ताओं, रूपकों या लोकगीतों का प्रसारण जरूर पूर्व रेकॉर्डेड होता था लेकिन नंदाजी-भेराजी और कान्हा जी अमूमन बिना किसी कागज के कार्यक्रम प्रसारित कर देते थे।

इंदौर में निकलने वाले गणेश विसर्जन की झाँकियों का सीधा प्रसारण, आकाशवाणी की काव्य-गोष्ठियों का संचालन, बच्चों के कार्यक्रम में छक्कन चाचा के रूप में दीदी रणजीत सतीश के साथ लाइव प्रसारण और हाँ उज्जैन में होने वाले सिंहस्थ के शाही स्नान के सीधे प्रसारण और रेडियो रिपोर्ट में दुबेजी एक स्थायी स्तंभ होते थे। कम लोगों की जानकारी में है कि वे प्रगतिशील लेखक संघ, इन्दौर के संस्थापकों में से एक थे। जूनी इंदौर के ओटलों पर शरद जोशी, रमेश बक्षी, प्रभाष जोशी, रामविलास शर्मा, महेन्द्र त्रिवेदी और दुबेजी जैसे युवकों की टोली खूब बतियाती और लिखने-पढ़ने की दुनिया में अपनी आमद के ख़्वाब बुना करती थी।

कृष्णकांत दुबे के जाने से मालवा का एक शब्दनायक चला गया है। उनके होने से सहजता और शालीनता का पता मिलता था। हाँ, इस बात का हमेशा अफसोस रहेगा कि कृष्णकांत दुबे के भीतर बसे सक्षम हिन्दी कवि का सही मूल्यांकन नहीं हो पाया।

सुमनजी स्वयं दुबेजी की कविताओं के कायल थे और उन्हें जब-तब लिखते रहने के लिए प्रेरित करते थे, लेकिन शायद मालवा-हाउस की व्यस्तताओं में कवि कृष्णकांत दुबे उभर कर नहीं आ पाए। हाँ, यह भी कहना चाहूँगा कि दुबेजी की प्रतिभा और सीधेपन का सीधा लाभ उनके समकालीनों ने खूब लिया और राष्ट्रीय स्तर पर जब सम्मानों और पुरस्कारों की बात आई तो श्रेय लेने खुद आगे हो गए।

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आकाशवाणी इंदौर का वर्तमान रूखा दौर शायद मालवा हाउस के इस सपूत पर कोई रस्मी कार्यक्रम कर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर ले या ना भी करे, लेकिन बिलाशक इस परिसर के जर्रे-जर्रे में मोहक मुस्कान और बड़ी-बड़ी आँखों वाले नंदाजी के किए हुए काम के सुनहरे कलेवर जगमगाते रहेंगे। दुबेजी जिंदगी भर अपनी माँ की नसीहत का पालन करते रहे कि 'नाना छटाक भर का मन पे... मन भर को वजन मती लीजे' (बेटा छोटे से दिल पर जमाने भर का तनाव मत रखना)। मालवा हाउस के कर्मी उन्हें याद करें न करें, लेकिन उस परिसर के बूढ़े पेड़ जरूर नंदाजी की याद में आँसू बहा रहे होंगे। राम-राम हो नंदाजी !

 

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