मंजूर-नामंजूर : मृदुला गर्ग की प्रेम कहानियाँ

पुस्तक समीक्षा

Book review
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मंजूर-नाकी प्रेम कहानियों का संचयन है जो से आया है। लगभग अस्सी कहानियों में से चुनी ये चौदह कहानियाँ मृदुला जी की प्रेम संबंधी मान्यताओं का रचनात्मक आख्यान भी है। भूमिका में वह लिखती हैं, 'प्रेम के संदर्भ में जो प्रश्न सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, वह स्वाधीनता का है। समझती हूँ कि प्रेम और स्वाधीनता के बीच जो द्वंद्व देखा जाता है, वह मोह और प्रेम के बीच फर्क न करने के कारण पैदा होता है।' 'मेरा' उनकी प्रतिनिधि कहानी है।

यहाँ मीता जिन दबावों और तनावों के बीच निर्णय सक्षम बनती है, वह पाठक को प्रभावित करता है और उसे सक्रिय बनाता है। जिस स्वाधीनता की पक्षधरता मृदुला जी प्रेम में चाहती हैं, उसका ठीक-ठीक अंकन यह कहानी करती है। 'अगर यों होता' रोमानी भावुकता से लबरेज होने पर भी स्त्री-जीवन के यथार्थ की कहानी है। यहाँ पुराने प्रेमी के अनायास मिल जाने पर परिवार का बंधन मधुर को रोक लेता है।

इसके उलट 'अवकाश' में यह स्त्री अपने पति और बच्चों को छोड़ने का निर्णय लेकर प्रेमी के पास लौट जाती है। लेकिन विवेकवान और निर्णय सक्षम दिखाई दे रही यह स्त्री जब अंत में अपने पति से कहती है, 'यह तो भाग्य है या फिर मेरी कृतघ्नता', तो यह विवेक बहुत वास्तविक नहीं लगता। यही नहीं यह स्त्री विदा लेते समय एक बार अपने पति के साथ 'एक शरीर' हो जाती है। और यहाँ भी-'पानी डालते समय उसने सोचा, यह तो सर्दी से ठिठुरते भिखारी पर दुशाला डाल देने जैसी बात हुई। जाना तो मुझे है ही।'

संग्रह में पठनीय और सार्थक कहानियों की कमी नहीं है। 'डैफोडिल जल रहे हैं,' 'संगत', 'मंजूर-नामंजूर' और 'साठ साल की औरत' इनमें विशेष तौर पर रेखांकित की जानी चाहिए। मृदुला जी की ये कहानियाँ एक खास तौर की स्त्री के व्यक्तित्व का परिचय भी देती हैं क्योंकि अस्मितावादी विमर्श की आहटों से पहले ये लिखी जा चुकी थीं। वस्तुतः इन कहानियों को पढ़ना मृदुला गर्ग के लेखन के एक प्रतिनिधि स्वर को पहचानना भी है।

: मंजूर-
लेखिका : मृदुला गर्ग
प्रकाशन : आलेख प्रकाशन

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