कितना खाएँ पान बनारस वाला

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पान औषधि है किंतु अधिक मात्रा में सेवन करने से अन्य रोग भी उत्पन्न करता है, जिनमें प्रमुख दंतदौर्बल्य, रक्त की कमी (एनीमिया), नेत्ररोग एवं मुख के रोग हैं। जैसा कि कहा गया है अति सर्वत्र वर्जयेत, अर्थात किसी भी चीज की अति बुरी होती है। लोग चाहे जब पान खा लेते हैं तथा कई निरंतर चबाते रहते हैं। इससे फायदा होने के बजाय नुकसान अधिक होता है।

पान का प्रचलन अत्यंत प्राचीन समय से चला आ रहा है। भोजन के पश्चात पान का सेवन करते प्रायः लोगों को देखा जा सकता है। भोजन पश्चात पान का सेवन भोजन को पचाने हेतु एवं मुखशुद्धि (माउथ फ्रेशनर) के रूप में होता है। इसका प्रचलन आयुर्वेद में प्राचीनकाल से है। उस समय औषधि के रूप में पान का सेवन किया जाता था।

पान के साथ कपूर, जायफल, लवंग, कत्था, लताकस्तूरी, शीतलचीनी, चूना व सुपारी को डालकर खाया जाता था। इससे मुख में दाँत, जीभ, मुँह में अधिक कफ आना, भोजन में अरुचि एवं गले के रोगनष्ट होते थे। इसके अतिरिक्त कृमि को नष्ट करने वाला एवं कामोत्तेजक होता था।

पान क्षारीय (अल्कली) प्रकृति का होता है यह मुख की दुर्गन्ध, कफ, थकावट एवं स्वरयंत्र (लेरीग्स) के रोगों को नष्ट करता है।

पान लता प्रजाति की वनस्पति है तथा इसका पत्ता ही पान कहलाता है। इसे औषधि के रूप में ग्रहण किया जाता है। संस्कृत में ताम्बूल, ताम्बूलवल्ली, नागवल्ली आदि अनेक नामों से जाना जाता है। अँगरेजी में बिटल लीफ एवं बॉटनी में इसे पाइपर बीटल कहा जाता है यह पाइपरेसीफेमेली का सदस्य है। पान की अनेक प्रजातियाँ होती हैं आयुर्वेद में सात प्रकार की जातियाँ बताई गई हैं।

1. श्रीवटो (सिरिवाडी पान) 2. अम्लवाटी (अंबाडे पान) 3. सतसा (सातसी पान) 4. गुहागरे (अडगर पान) 5. अम्लसरा (मालवा में होने वाला अंगरा पान) 6. पटुलिका (आंध्रप्रदेश का पोटकुली पान) 7. ह्वेसणीया (समुद्र देश का पान) इसके अतिरिक्त बंगला, साँची, महोबा, महाराजपुरी, विलोआ, कपूरी, फुलवा आदि अनेक प्रजातियाँ सेवन की जाती हैं।

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डॉ. संजीव कुमार लाले़



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