क्या है प्राइमल थैरेपी?

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-राधेलाल शर्म

प्राइमल थैरेपी यानी प्रति-प्रसव प्रक्रिया। प्रति-प्रसव एक सुंदर शब्द है। बच्चे के जन्म को प्रसव कहते हैं। प्रति-प्रसव का अर्थ है- स्मृति जगाकर बचपन के अनुभवों को पुनः जीकर जन्म के क्षण तक पहुँचना। दूसरे अर्थों में कार्य को कारण तक यानी मूल स्रोत तक लौटाना ताकि जड़ तक उतरकर समस्या सुलझाई जा सके। प्रत्यावर्तन की इस प्रक्रिया में अद्भुत अनुभव होता है।

बीसवीं सदी में पश्चिम ने मनोविज्ञान के क्षेत्र में बड़ी ऊँचाइयाँ छुई हैं। इस सदी में मन की उलझनों, समस्याओं व मनोरोगों पर काफी चिंतन, विश्लेषण व मनोचिकित्सकीय प्रयोग हुए हैं। फ्रायड, जुंग, एडलर, अब्राहम मेस्लो, विलिहेम रेक, मेसागोली विलियम जेम्स जैसे मनोविज्ञानी व मनोविश्लेषकों ने अपने क्रांतिकारी दर्शन व प्रयोगों द्वारा सारे विश्व में तहलका मचा दिया है। इसी परंपरा के एक और ख्यातिनाम मनोविज्ञानी जेनौव ने एक अति महत्वपूर्ण मनोचिकित्सा विश्व के सम्मुख रखी है, जिसका नाम है- प्राइमल थैरेपी।
प्राइमल थैरेपी यानी प्रति-प्रसव प्रक्रिया। प्रति-प्रसव एक सुंदर शब्द है। बच्चे के जन्म को प्रसव कहते हैं। प्रति-प्रसव का अर्थ है- स्मृति जगाकर बचपन के अनुभवों को पुनः जीकर जन्म के क्षण तक पहुँचना। दूसरे अर्थों में कार्य को कारण तक यानी मूल स्रोत तक लौटाना ताकि जड़तक उतरकर समस्या सुलझाई जा सके। प्रत्यावर्तन की इस प्रक्रिया में अद्भुत अनुभव होता है।
प्रति-प्रसव की मनोचिकित्सा में व्यक्ति पुनः बच्चा बन जाता है। वर्तमान का प्रौढ़ या युवा व्यक्ति बचपन के 'बबलू' को फिर से जीकर उस चीख तक लौट जाता है, जहाँ से उसकी जिंदगी की शुरुआत हुई थी। इस प्रयोग में व्यक्ति गुड्डे-गुड्डियों व खिलौनों का भी सहारा लेते हैं। पीछे लौटने में वे हाथ-पैर मारते, चिल्लाते व रोते-चीखते हैं। मनोविज्ञान की खोजें कहती हैं कि जीवन की कोई भी अवस्था कभी गुम नहीं होती। बच्चा जब युवा होता है तो भी 'बच्चा' उसके भीतर गहरे में मौजूद रहता है। केवल युवा उस पर आरोपित हो जाता है। इसी प्रकार वृद्धावस्था की एक और पर्त उसके ऊपर आ जाती है। प्याज की नाईं व्यक्ति के भीतर सभी पर्तें मौजूद रहती हैं। इन पर्तों में उतरने से व्यक्ति उस कालखंड में पुनः जीने में समर्थ हो जाता है।
इस संबंध में पश्चिम के एक अन्य वैज्ञानिक रान हुब्बार्ड की महत्वपूर्ण खोज की चर्चा करना भी प्रासंगिक होगा। उनकी कीमती खोज है- 'टाइम ट्रेक' की। हुब्बार्ड मानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जहाँ भी जिया है, चाहे पृथ्वी पर या अन्य ग्रह पर, आदमी की तरह या जानवर, पौधे या पत्थर की भाँति- इस अनंत यात्रा में समय की पूरी धारा यानी 'टाइम ट्रेक' उसके भीतर हमेशा संरक्षित रहती है। यह धारा खोली जा सकती है। इस धारा में व्यक्ति को पुनः प्रवाहित किया जा सकता है। इस 'टाइम ट्रेक' पर आदमी के भीतर 'इन्ग्रेन्स' यानी पक्के रंग की तरह गहरेस्थान मौजूद होते हैं। ये भीतर गहरे में दबे पड़े रहते हैं। इन्हें खोला जा सकता है। 'टाइम ट्रेक' को समय में पीछे लौटना कह सकते हैं।



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