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Written By WD

पानी रे पानी

बाल्टियाँ काका वेबू
काका - अरे वेबू ये हाथों में पानी की बाल्टियाँ लिए कहाँ चले जा रहे हो?

वेबू - जान बूझकर अनजान बन रहे हो काका। बाल्टियों में अब कोई घी दूध तो आता नहीं पानी ही आता है सो भी बड़ी मुश्किलों के बाद यदि किस्मत हो तो। वही लेने जा रहा हूँ। मेरे साथ चलोगे ?

काका - हाँ हाँ क्यों नहीं ? सुना है कि प्रशासन के अधिकारीगण बड़ी दौड़ धूप कर रहे है।

छत के पानी का शुद्धिकरण करके नलकूप के पुनर्भरण की तकनीक बना रहे हैं।

वेबू - वो तो ठीक है काका मगर पानी की कमी का प्रचार ठीक बात नहीं।

काका - वह क्यों ?

वेबू - सीधी सी बात है। महिलाओं की फितरत सभी जानते हैं कि जिस चीज की कमी का अंदेशा हो उसका संग्रह करने के लिए वे आतुर हो उठती हैं। मैं तो कहता हूँ कि यदि शहर में ढिंढोरा पीट दिया जाए कि जून माह तक के लिए भरपूर पानी है तो देखना पानी की अतिरिक्त माँग एकदम खत्म हो जाएगी।

काका - बात तो तुम पते की कह रहे हो । पानी मिलने पर तुम्हारी काकी भी बाल्टी घड़ों के साथ रसोई घर के सारे छोटे-बड़े बर्तन भी भरकर रख लेती है। क्योंकि पता नहीं दूसरे दिन पानी मिले या न मिले।

वेबू - यह तो काका की दूरदर्शिता है। इसमें क्या बुराई है?

काका - बुराई इस बात में है कि यदि दूसरे दिन भी पानी आ गया तो फिर पहले दिन के पानी का तबीयत से पूरा-पूरा उपयोग किया जाकर नया भर दिया जाता है। जबकि पानी न आने की स्थिति में वही पानी दो तीन दिन तक निकाल देता।

वेबू - आपने समझाने की कोशिश तो की होगी काकी को।
काका - अरे पानी में बोल कर क्या अपना दाना पानी बंद करवाना है।

वेबू - खैर पानी की बचत दूसरे तरीकों से भी की जा सकती है। वैज्ञानिकों ने आजकल देखो पेड़-पौधों को सींचने के लिए डिप पद्धति तैयार की है।

काका - अरे काहे की वैज्ञानिकों की खोज । सारी खोजों के रहस्य पुराने शास्त्र ग्रंथों में दिए हैं।

वेबू - क्यों फांकते हो काका ? अब भला पानी की बचत की डिप पद्धति बताइए किस शास्त्र में है?

काका - अरे किसी भी शिवजी के मंदिर में चले जाइए। जिन शंकर भोले के मस्तक से स्वयं गंगा मैया निकलती हैं उन्हीं को इसी डिप पद्धति से घड़े में छिद्र कर बूँद-बूँद से नहलाया जाता है। पानी के संयमित उपयोग का इससे सुंदर उदाहरण कहाँ मिलेगा।

वेबू - पानी का दुरुपयोग लगातार होता रहा तो पीने का पानी इंसान को भी डिप पद्धति से मिलेगा।