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मेरे हिस्से आई अम्मा...

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आलोक श्रीवास्तव की रचना -2 

धूप हुई तो आंचल बनकर कोने-कोने छाई अम्मा,
सारे घर का शोर-शराबा, सूनापन, तन्हाई अम्मा.
 
उसने ख़ुद को खोकर मुझमें एक नया आकार लिया है,
धरती, अंबर, आग, हवा, जल जैसी ही सच्चाई अम्मा.
 
घर में झीने-रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे,
चुपके-चुपके कर देती है, जाने कब तुरपाई अम्मा.
 
सारे रिश्ते-जेठ-दुपहरी, गर्म-हवा, आतिश, अंगारे,
झरना, दरिया, झील, समंदर, भीनी-सी पुरवाई अम्मा.
 
बाबूजी गुजरे; आपस में सब चीजें तक्सीम हुईं, तब-
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा.