एक बार मैंने कम्प्यूटर विज्ञान की क्लास में विद्यार्थियों को बहुत कठिन प्रश्न हल करने के लिए दिया। कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग तकनीकी होने के साथ-साथ एक कला भी है।
विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजरते हुए विद्यार्थी समस्या के समाधान तक पहुँचते हैं। मैं कभी भी अपने विद्यार्थियों को एक ही तरीके से नतीजे पर पहुँचने के लिए नहीं कहती।
मैं विद्यार्थियों को हमेशा आजादी देती हूँ कि वे किसी भी प्रणाली के माध्यम से नतीजे पर पहुँच सकें। जो प्रश्न विद्यार्थियों को हल करने के लिए मैंने दिया था वह बहुत कठिन था तथा उसको हल करने के लिए खुद मुझे एक सप्ताह लगा था। जब मैंने समस्या का समाधान कर कक्षामें प्रवेश किया तो विद्यार्थी उसे देखना चाहते थे।
अपनी छात्रा नलिनी को मैंने सीडी दी और कहा कि वह नकल कर उस सीडी को वापस कर दे। साथ ही कहा- इसे ध्यान से रखना, क्योंकि मेरे पास इसकी एकमात्र प्रति है। नलिनी ने जब डिस्क को कम्प्यूटर ड्राइव में लगाया तब सभी प्रोग्राम देखने के लिए उसे घेरकर खड़े हो गए।
मैं विश्व को दिखाना चाहती थी कि लड़कियाँ सब कुछ कर सकती हैं। अब मैं इस तर्क पर हँसती हूँ। यदि पुरुष कुछ क्षेत्र में अच्छा कर सकते हैं, तो महिलाएँ दूसरे क्षेत्र में। पुरुष और महिलाएँ एक-दूसरे के पूरक हैं।
वह मुझसे बात कर रही थी कि अचानक गलती से उसने डिस्क को फार्मेट कर दिया। डिस्क से सभी सामग्री गायब हो गई थी। सभी विद्यार्थी दंग रह गए। वे मुझे देखने लगे।
नलिनी रोने लगी क्योंकि वह जानती थी कि मैं एक सप्ताह से उस समस्या का समाधान ढूँढने की कोशिश कर रही थी। कुछ देर के लिए मैं बहुत दुःखी थी। पाँच मिनट तक मैं चुप रही, फिर मैं मुस्कुराने लगी थी। एक मुस्कुराहट से चिंता दूर हो सकती है।
मुस्कुराहट चिंता को दूर करती है और दोस्ती के लिए एक बहुत अच्छी दवाई का काम करती है। मेरे विद्यार्थी ही मेरे सबसे करीबी दोस्त थे, हैं। मेरी मुस्कुराहट से सभी की चिंताएँ दूर हो गईं। मैं चुपचाप उठकर खड़ी रह गई। नलिनी अब भी रो रही थी।
क्षमा माँगते हुए उसने कहा- मैडम, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने कहा कि नलिनी मुझे मालूम है कि तुमने जान-बूझकर यह गलती नहीं की है। गलती किसी से भी हो सकती है। यदि किसी ने कहा कि उसने कभी गलतियाँ नहीं कीं तो वह इंसान नहीं है, बल्कि कोई रोबोट है।
इंसान से ही नहीं, ऋषि-मुनियों से भी गलतियाँ हो सकती हैं। सबको मिलकर अब यह देखना है कि हम प्रोग्राम को फिर से ठीक कर सकते हैं या नहीं।
किसी ने मुझसे पूछा कि मैडम इतना कुछ होने के बाद आप धैर्य कैसे रख लेती हैं जबकि आपने आधे से ज्यादा समय उस काम को करने में बिता दिया था। मैंने कहा- मुझे पता है कि मैंने बहुत समय इस समस्या का समाधान निकालने में बिताया है।
मैं इस प्रोग्राम को फिर से लिखने की कोशिश करूँगी। मैं इसलिए चुप रही, क्योंकि एक बार मैंने भी ऐसी गलती की थी। विद्यार्थियों की प्रार्थना थी कि मैं उन्हें वह किस्सा सुनाऊँ । मैं उन्हें अपनी कहानी सुनाने लगी।
प्यार, अपनेपन की भावना तथा गुणों की प्रशंसा से ही अच्छे संबंध बन सकते हैं। हम अपना ज्यादा से ज्यादा समय काम करने में व्यतीत करते हैं। यह समय खुशी से बिताना चाहिए, न कि एक-दूसरे पर इल्जाम लगाकर।
जब मैं युवती थी तब इस बात को लेकर बहुत ही संवेदनशील रहती थी कि लोग लड़कियों के बारे में क्या टिप्पणियाँ करते हैं।
यदि वे कहते हैं कि लड़कियाँ काम नहीं कर पाती हैं तो मैं उस कार्य को करने की कोशिश करती थी, ताकि उन्हें अपनी गलती का अहसास हो सके।
मैं विश्व को दिखाना चाहती थी कि लड़कियाँ सब कुछ कर सकती हैं। अब मैं इस तर्क पर हँसती हूँ। यदि पुरुष कुछ क्षेत्र में अच्छा कर सकते हैं, तो महिलाएँ दूसरे क्षेत्र में। पुरुष और महिलाएँ एक-दूसरे के पूरक हैं।
मैं एक कम्प्यूटर कंपनी में सिस्टम एनॉलिस्ट का काम कर रही थी। उस समय कम्प्यूटर हार्डवेयर इतना एडवांस नहीं था। आज एक प्लॉपी साढ़े तीन इंच की होती है। उस समय एक बड़ा भारी टैंडम डिस्क प्रयोग किया गया था, जिसका वजन 15 किलो था। एक बार कंपनी प्रबंधक ने कहा कि इस डिस्क को केवल पुरुष ही उठा सकते हैं।
उनकी इस बात से मुझे बहुत दुःख हुआ और मैंने उनसे कहा कि मैं इसे उठाकर दिखाऊँगी। मैं बहुत ही गहराई से मानती थी कि यदि किसी व्यक्ति की भावनाएँ चेहरे से झलकती हैं तो यह उसकी कमजोरी है।
आज मैं मानती हूँ कि भावनाओं को व्यक्त करना अच्छा होता है। डिस्क जब मैं लेकर आई तो मेरे बॉस ने मुझसे पूछा- तुम इसे कैसे उठाकर लाईं।
बिना सोचे-समझे खुशी के मारे मैंने अपना हाथ उठा दिया, जिससे डिस्क जमीन पर गिरकर टूट गई। उसकी आवाज पूरे दफ्तर में सुनाई दी। ऑफिस में जितने भी कर्मचारी मौजूद थे, वे मुड़कर मुझे देखने लगे।
कंपनी के इतिहास में ऐसी गलती किसी ने नहीं की थी। यह मेरी सबसे बड़ी गलती थी जो कि माफ कर देने योग्य भी नहीं थी। कंपनी का पूरा डेटा एक क्षण में खत्म हो गया था।
मैं हैरान रह गई थी। चुपचाप खड़ी होकर मैं यह सोच रही थी कि मेरी मूर्खता के कारण पूरी कंपनी को परेशानी उठाना पड़ेगी। एक कर्मचारी को हमेशा कंपनी की बेहतरी के लिए काम करना चाहिए, परंतु उफ्, ये मैंने क्या कर दिया? मैं अपनी सीट पर वापस लौट गई थी।
मैं इतनी स्तब्ध थी कि मेरी आँखों में आँसू छलक आए थे। मैं एकदम शांत बैठ गई। कुछ देर तक बैठी रही। फिर मैंने एक कागज पर अपना इस्तीफा लिख दिया।
मैं इस तरह ही अपनी गलती का प्रायश्चित कर सकती थी। मैंने अपने बॉस के कमरे में जाकर उन्हें अपना त्यागपत्र दे दिया। उनके सामने सिर झुकाकर खड़ी हो गई।
मैं इतनी स्तब्ध थी कि मेरी आँखों में आँसू छलक आए थे। मैं एकदम शांत बैठ गई। कुछ देर तक बैठी रही। फिर मैंने एक कागज पर अपना इस्तीफा लिख दिया।
उन्होंने बड़े ध्यान से त्यागपत्र पढ़ा तथा पढ़ने के बाद फाड़कर फेंक दिया। उन्होंने कहा कि गलती हर किसी से होती है। मैंने उस डिस्क का बैकअप लेकर रख लिया था।
तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं, पश्चाताप अपने आप में एक प्रकार की सजा होती है जो कि तुम पहलेही बहुत कर चुकी हो।
तुम्हें इतना भावुक नहीं होना चाहिए। जिंदगी में भावुक व्यक्ति बहुत कष्ट उठाते हैं। जाओ और जाकर अपना काम करो। कुछ कहने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे।
अब मैं नलिनी की तरफ देख रही थी और उससे कहा- 'चिंता मत करो, मैं प्रोग्राम को वापस लिखूँगी। घर में मेरे पास कुछ प्रोग्राम लिखे हुए हैं।'
इस घटना से मैंने यही सीखा है कि जब एक व्यक्ति संस्था प्रमुख बन जाता है, तब उसे अपने अधीनस्थों को माफ कर देना चाहिए। अपने बॉस के भय से उसके साथ आपके संबंध अच्छे नहीं हो सकते हैं।
प्यार, अपनेपन की भावना तथा गुणों की प्रशंसा से ही अच्छे संबंध बन सकते हैं। हम अपना ज्यादा से ज्यादा समय काम करने में व्यतीत करते हैं। यह समय खुशी से बिताना चाहिए, न कि एक-दूसरे पर इल्जाम लगाकर।