मेरठ की मशहूर गजक की मिठास और खुशबू अब सिर्फ उत्तर प्रदेश या देश की सीमाओं तक नहीं रहेगी, बल्कि विदेशों में बैठे लोग भी इसके असली स्वाद का आनंद ले सकेंगे। वजह है 121 साल पुरानी मेरठ की तिल-गुड़ से बनी गजक को मिला जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानी GI टैग।
मेरठ रेवड़ी-गजक व्यापारी वेलफेयर एसोसिएशन के लंबे प्रयासों के बाद यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई है। GI टैग मिलने के साथ ही मेरठ की गजक अब आधिकारिक तौर पर “विशिष्ट क्षेत्रीय उत्पाद” बन गई है।
क्या है GI टैग?
GI टैग किसी खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े उत्पाद को दिया जाने वाला प्रमाण है, जो उसकी गुणवत्ता, पहचान और मौलिकता को सुनिश्चित करता है। इससे नकली उत्पादों पर रोक लगती है और स्थानीय कारीगरों को उनके हुनर का उचित मूल्य और वैश्विक पहचान मिलती है। अब GI टैग के साथ मेरठ की गजक विश्व मानचित्र पर अपनी खास जगह बना चुकी है।
गजक के निर्माण की कहानी भी है गजब
इस मशहूर मिठाई का जन्म भी एक दिलचस्प गलती से हुआ। कहते हैं कि 1904 में मेरठ के गुदड़ी बाजार में लाला रामचंद्र सहाय की दुकान थी। एक दिन कारीगर तिल-बुग्गा बनाने की तैयारी कर रहे थे, तभी पास में चिक्की के लिए गुड़ गर्म किया जा रहा था। अचानक गरम गुड़ गलती से तिल के पात्र में गिर गया। लाला रामचंद्र ने नुकसान से बचने की सोची और कारीगरों से कहा 'इसे फेंको मत, कुछ नया बनाकर देखो।' करीब तीन घंटे की मेहनत और सूझबूझ के बाद तिल और गुड़ से एक नई मिठाई तैयार हुई- रेवड़ी जैसी, लेकिन स्वाद में अलग। जब यह बाजार में आई तो लोगों को खूब भा गई।
यहीं से शुरू हुआ सुधारों का सिलसिला और 1915 में रेवड़ी-गजक ने अपना अलग अस्तित्व बना लिया। यह मिठाई इतनी लोकप्रिय हुई कि अंग्रेज अधिकारी भी इसके मुरीद हो गए। धीरे-धीरे यह “रामचंद्र सहाय की गजक” के नाम से प्रसिद्ध हो गई।
पीढ़ियों से कायम स्वाद की विरासत
1927 में लाला रामचंद्र सहाय के निधन के बाद भी गजक की पहचान फीकी नहीं पड़ी। पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह स्वाद और कारीगरी आगे बढ़ती रही। आज भी सर्दियों में मेरठ की गलियों में गजक की खुशबू दूर-दूर तक फैल जाती है। आसपास के जिलों और राज्यों से लोग खास तौर पर गजक खरीदने मेरठ आते हैं। गजक का कारोबार साल में लगभग 4 महीने चलता है, जैसे-जैसे सर्दी बढ़ती है, वैसे ही इसका जायका बढ़ता है, चार माह में यह कारोबार लेकिन 70 से 100 करोड़ रुपये का टर्नओवर देता है।
आज भी वही हाथों का जादू
सबसे खास बात यह है कि मेरठ की गजक आज भी मशीनों से नहीं, बल्कि कारीगरों के हाथों से बनती है।
इसमें किसी तरह का कृत्रिम रंग, एसेंस या केमिकल नहीं डाला जाता। स्वाद और खुशबू के लिए लौंग, इलायची, जावित्री और जायफल का इस्तेमाल होता है, जो सर्दियों में सेहत के लिए भी फायदेमंद माने जाते हैं।गजक बनाने की प्रक्रिया भी पारंपरिक है, कढ़ाही में गुड़ गरम किया जाता है, फिर उसकी पिटाई (थपका) होती है और उसके बाद रेवड़ी-गजक तैयार की जाती है।
परंपरा से ट्रेंड तक
पहले सिर्फ गुड़ की रेवड़ी, लड्डू और काजू वाली गजक बनती थी। फिर समय के साथ वैरायटी बढ़ती गई, पट्टी गजक, स्प्रिंग रोल गजक, चॉकलेट रोल गजक, ड्राई फ्रूट समोसा गजक समते आज मेरठ में 30-40 प्रकार की गजक उपलब्ध है।
GI टैग से खुश कारीगर और व्यापारी
मेरठ रेवड़ी-गजक व्यापारी वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष अंबुज रस्तोगी बताते हैं कि इस कारोबार से 10 हजार से अधिक लोग जुड़े हुए हैं..GI टैग मिलने से गजक को देश-विदेश में नई पहचान मिलेगी, व्यापार बढ़ेगा और रोजगार के नए अवसर बनेंगे।
एसोसिएशन के पदाधिकारी समीर थापर कहते हैं कि जैसे मेरठ की कैंची, बैंड-बाजा और खेल उत्पाद विश्व प्रसिद्ध हैं, वैसे ही अब मेरठ की गजक भी वैश्विक पहचान बनाएगी। यह पहले ही वियतनाम और यूके, यूएस में धूम मचा रही है।
गलती से जन्मी, अब विश्व मंच पर
गजक के जन्मदाता लाला रामचंद्र सहाय की चौथी पीढ़ी से जुड़े दीपक जिंदल कहते हैं कि एक छोटी सी त्रुटि से जन्मी गजक आज विश्व पटल पर मेरठ की पहचान बनेगी। GI टैग मिलना हमारे लिए गर्व की बात है। GI टैग मिलने पर एसोसिएशन ने चेन्नई स्थित GI विशेषज्ञ, GI मैन डॉ. रजनीकांत का विशेष आभार भी व्यक्त किया है। Edited by : Sudhir Sharma