फ़िराक़ गोरखपुरी : उर्दू के अज़ीम शाइर

इक उम्र तक ख़लिश पाली 'फ़िराक़' ने

WD|
कई सम्मान किए अपने नाम : पद्मभूषण, साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ अवार्ड जैसे कई सम्मान हासिल करने वाले 'फ़िराक़' ने खुद अपने बारे में शेर कहा था कि-

'आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअस्रों,
जब ये ख़याल आएगा उनको, तुमने फ़िराक़ को देखा था।'

उच्चकोटि के निर्भीक शाइर थे 'फ़िराक़' : शायरी को लेकर 'फ़िराक़' ने बहुत काम किया। उनकी शायरी उच्चकोटि की मानी जाती है। वे एक निर्भीक शायर थे। कविता संग्रह 'गुलेनग्मा' पर उन्हें 1960 में 'साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इसी रचना पर 1969 में देश के एक और प्रतिष्ठित सम्मान 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से सम्मानित किए गए। उन्होंने एक उपन्यास 'साधु और कुटिया' और कई कहानियाँ भी लिखी थीं। उर्दू, हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषा में उनकी 10 गद्य कृतियाँ भी प्रकाशित हुईं।

आँखें मूंद ली, मगर ज़िंदा हैं : फ़िराक़ गोरखपुरी की कुछ प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-

'गुल-ए-नग़्मा', 'गुल-ए-राना', 'मशअल', 'रूह-ए-काएनात', 'शबिस्तां', 'सरगम', 'बज़्म-ए-ज़िंदगी', 'रंग-ए-शायरी', रूप (रुबाई), 'नग्म-ए-साज़', 'धरती की करवट', 'चिरागां', 'हज़ार दास्तान', 'जुगनू', 'नकूश', 'आधीरात', 'परछाइयाँ', 'तराना-ए-इश्क़' आदि उनकी महत्वपूर्ण रचनाएं हैं। यूँ तो इस अज़ीम शाइर ने 3 मार्च 1982 को हमेशा के लिए आँखें मूँद लीं। मगर उनका लिक्खा कोई शेर जब भी किसी ज़ुबाँ पर आएगा, वो जी उट्ठेंगे। और शायद कह भी उट्ठें कि-
'बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं,
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं।'


और भी पढ़ें :