क्यों तेरे ग़म-ए-हिज्र में नमनाक हिं पलकें क्योंकि याद तेरी आते ही तारे निकल आएबरसात की इस रात में ए दोस्त तेरी याद इक तेज़ छुरी है जो उतरती ही चली जाए कुछ एसी भी गुज़री हैं तेरे हिज्र में रातें दिल दर्द से ख़ाली हो मगर नींद न आएशायर...