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Written By अनहद

सारे भेद खोल के भी खाली हाथ

राजीव खंडेलवाल
राजीव खंडेलवाल बस यही नहीं कहते कि अबे अब खेल छोड़ दे, तू सारे पैसे हारने वाला/वाली है। वरना तो वे बहुत साफ इशारे करते हैं। इतने साफ कि टीवी पर "सच का सामना" देखने वालों को समझ आ जाता है कि अब जो सवाल पूछा जाएगा, उसके जवाब के बारे में पोलीग्राफ मशीन की राय खेलने वाले के खिलाफ होगी। बहुत से ऐसे लोग यहाँ आकर दस लाख रुपए से हाथ धो बैठते हैं, जिनके लिए दस लाख रुपए बड़ी रकम होती। जिन लोगों ने कभी (बैंक जाकर भी) दस लाख रुपया एक साथ नहीं देखा वो भी दस लाख को दाँव पर लगा देते हैं और हार जाते हैं। अभी तक कोई भी खिलाड़ी इस शो से पच्चीस लाख नहीं ले जा सका है। ले जाने की बात दूर पच्चीस लाख तक पहुँच भी नहीं सका है।

तमाम कठिन सवालों के जवाब पहले ही दे चुकने वाले लोग छोटे से सवाल में उलझकर गिर पड़ते हैं। सवाल यह है कि उस वक्त खेलने वाले के मन में ऐसा क्या होता है? कुछ अनुमान हम लगा सकते हैं। इस शो में खेलने वाले लोगों की दशा वही होती है, जो ज्योतिष को हाथ दिखाने वालों की होती है। पश्चिम में जो काम मनोचिकित्सक करते हैं, वो अपने यहाँ ज्योतिष करता है। ज्योतिष आपके बारे में रुचि लेता है। आपका भूत-भविष्य (गलत-सलत और गोल-मोल ही सही) बताता है।

आपको लगता है कि आप महत्वपूर्ण हैं। ज्योतिष बताता है कि इतने बड़े ब्रह्माण्ड में आपका भी कुछ वजूद है। न सिर्फ वजूद है, बल्कि कई बड़े-बड़े ग्रह आपके भले और बुरे में रुचि रखते हैं और आपको लेकर झगड़ते रहते हैं। लोगों के अहं को बड़ी राहत मिलती है कि ज़माना चाहे मुझे ना कुछ समझे, पर बड़े-बड़े ग्रह हैं जो मेरे भले-बुरे के लिए परेशान रहते हैं। "सच का सामना" में भी कोई आपमें दिलचस्पी लेता है और आपका अतीत, आपका स्वभाव जानना चाहता है। आपको लगता है कि आप सौ करोड़ लोगों की नजरों में हैं। एक नशा-सा चढ़ जाता है और आप दस-बीस लाख को लात मारने की हालत में पहुँच जाते हैं। आप चाहते हैं कि तेज रोशनी का फोकस आपके चेहरे पर रहे और आपसे अनंतकाल तक सवाल पूछे जाते रहें। इस दुनिया में सबको अपने-अपने काम हैं। आप किसी को रोककर अपना सड़ियल अतीत सुनाना चाहें, तो कोई न सुने। क्योंकि यहाँ सबके अपने-अपने दुःख हैं और सबको अपनी-अपनी पड़ी है। ऐसे में किसे फुरसत है, जो किसी की रामकहानी सुनने में दिलचस्पी ले। एक अन्य कारण जिसका अनुमान लगाया जा सकता है, वो है जुआ खेलने का आनंद।

जुए का नशा तो हेरोइन के सौ इंजेक्शनों पर भारी है। जिस वक्त माल दाँव पर लगा होता है, उस समय जुआरी का चेहरा देखिए। लगता है जीवन में कुछ महत्वपूर्ण, कुछ सार्थक घटने वाला है, जिस पर जिंदगी का दारो-मदार है। जुए के बारे में एक सोच यह भी है कि जुआरी पैसे के लालच में नहीं खेलता, वो खेलता है जुए से मिलने वाली दिलो-दिमाग की उत्तेजना के लिए।

बहरहाल बुरा लगता है कि कोई शख्स अपने जीवन की किताब को खोलकर रख देता है, सब अच्छा-बुरा बता देता है और उसके हाथ लगता है सिंगट्टा। जिंदगी भर रिश्तेदारों के ताने-तिश्ने और बदनामी का कुछ तो मोल मिलना ही चाहिए। गुनाह बेलज्जत नहीं होना चाहिए।
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अनहद